Monday, November 18, 2019 04:04 AM

एक चुनाव में हर्ज क्या?

 नरपत दान चारण

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में चुनाव करवाना कोई आम बात नहीं है। देश में लगभग हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव होता रहता है। इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव है - धन का बेतहाशा खर्च। आम आदमी के कर से प्राप्त आय को चुनावों में पानी की तरह बहाया जाता है। यह एक नकारात्मक पक्ष है। इसके अलावा संसाधनों और मानव शक्ति का बड़े पैमाने पर उपयोग, समय का व्यय, विकास के कार्यों में रोड़ा। शासन व्यवस्था और कार्य चुनावी समय काल में विराम ले लेते हैं, तो नुकसान तो आखिर देश का है। तो इस समस्या के हल के लिए उपाय है एक चुनाव। अगर ऐसा संभव होता है तो हो सकता है कुछ गलत प्रभाव भी हों, लेकिन व्यापक रूप से देखें, तो यह फायदे का सौदा साबित होगा। बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू नहीं करनी पड़ेगी, जिससे नीतिगत फैसले लिए जा सकेंगे व विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे। नई परियोजनाओं की घोषणा कम समय के लिए ही रुकेगी। भारी चुनावी खर्च में कमी आएगी। काला धन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षा बलों को बार-बार चुनावी ड्यूटी पर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बार-बार चुनावी प्रचार से निजात मिलेगी। समय की बचत होगी। हालांकि यह कोई नई पहल नहीं है। कई देशों में एक साथ चुनाव होते हैं। स्वीडन में पिछले साल सितंबर में आम चुनाव, काउंटी और नगर निगम के चुनाव एक साथ कराए गए थे। इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, स्पेन, हंगरी, स्लोवेनिया, बेल्जियम में भी एक बार चुनाव कराने की परंपरा है।