Thursday, November 14, 2019 02:20 PM

एक नया आरंभ

श्रीश्री रवि शंकर

ऐसा लगता है कि हम इस दुनिया का एक भाग है, पर वास्तव में यह दुनिया हमारा भाग है। हम अपनी दुनिया को अपने मन में लेकर चलते हैं और हमारा मन तब तक शांत नहीं हो सकता जब तक हमारे आसपास की दुनिया में अशांति है। जब जीवन की मध्यावस्था की परेशानियां समय से पूर्व किशोरावस्था में ही आरंभ हो जाएं, समाज हिंसा और नशे की चपेट में आ जाए, मानवता केवल कल्पना मात्र में ही रह जाए, प्रसन्नता, प्रेम, दया केवल पुस्तकों और सिनेमा में ही देखने को मिलें, भ्रष्टाचार और अपराध को जीवन के अंग के रूप में स्वीकार कर लिया जाए, तब ये हमारे लिए संकेत हैं कि हमें समाज की चुनौतियों से लडने के लिए खड़े हो जाना चाहिए। आज हम पूरी दुनिया में मानवीय मूल्यों का विनाशकारी पतन देख रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में हमने इस देश की मानसिकता में बदलाव लाने के लिए युवा वर्ग में अभूतपूर्व जागरूकता तथा इच्छा को देखा है, परंतु हमें इस आवेग को अराजकता व हिंसा के निम्न स्तर पर जाने से रोकना होगा । आवश्यकता है कि इस ऊर्जा को रचनात्मक मार्ग की ओर मोड़ा जाए। हमें ऐसा वातावरण बनाना है जहां दोष लगाने और कमियां निकालने की अपेक्षा सहायता और सहयोग को बढ़ावा दिया जाए। जहां अधिकारी कानून और नियमों के पालन की रक्षा के लिए उत्तरदायी हैं, वहीं हमारा भी उत्तरदायित्व बनता है कि वातावरण से तनाव को दूर करने और समाज में मानवीय मूल्यों को बनाए रखने के लिए काम करें अन्यथा जिन लोगों तक यह संदेश नहीं पहुंचा है, वो आक्रोशवश हमें और हमारे प्रियजनों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। हम सब लोगों को बेहतर भारत के निर्माण के लिए कार्य करने के लिए थोड़ा समय अवश्य निकालना चाहिए, कम से कम सप्ताह में कुछ घंटे। यदि कुछ ही लोग इस विशाल व उदार दृष्टिकोण वाले हो जाएं, जो दूसरों के भावनात्मक हित का उत्तरदायित्व ले सकें, तो समाज के शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण होने की बड़ी संभावना है। हम सब अपने वातावरण को तनावमुक्त रखने के लिए छोटे-छोटे प्रयास तो कर ही सकते हैं। हमें अपनी खुशियां दूसरों के साथ बांटना सीखना होगा। यदि आप प्रसन्न हैं तो अपनी प्रसन्नता दूसरों के साथ बांटिए, इसे केवल अपने तक सीमित मत रखिए। इस भावना के साथ किया गया कोई भी कार्य सेवा है और दूसरों की मानसिक स्थिति को ऊपर उठाना सबसे बड़ी सेवा है। लेकिन हां, हमें इस बात के लिए सजग और संवेदनशील रहना होगा कि अधिक उत्साह में हम दूसरों की भावनाओं को ठेस न पहुंचाएं। जो कुछ भी हम को प्राप्त है, जब हम उसे दूसरों के साथ बांटते हैं, तो ईश्वर और अधिक प्रचुरता से वह आनंद हमारे ऊपर बरसाता है। आध्यात्मिक होने का यह अर्थ नहीं है कि दुनिया की ओर से आंखें फेर ली जाएं। इसके विपरीत जितना अधिक आप स्वयं के बारे में जानते जाते हैं, उतना अधिक ही आप दूसरों के विषय में जानने लगते हैं और उन चीजों को भी जानने लगते हैं, जो सामने नहीं होती। कहीं न कहीं अंदर से हम सब यह जानना चाहते हैं कि हम कौन हैं, हम यहां क्यों है और हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? आध्यात्मिकता का अर्थ है आत्मज्ञान की इस जिज्ञासा को जीवंत रखना और इस लक्ष्य को कभी न छोड़ना।