Monday, July 22, 2019 12:40 AM

एक ही वक्त पर चुनाव

राष्ट्रीय स्तर पर ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ की बहस के निष्कर्षों से पहले हिमाचल में स्थानीय निकायों के चुनावों को एक सूत्र में पिरोने की तैयारी शुरू हो रही है। यदि सब कुछ ठीक रहा तो पंचायत से नगर निगम तक के चुनाव एक ही सियासी थाली पर होंगे और इससे विकास का एक नया संदेश दिया जा सकेगा। जाहिर है चुनावी खर्च में कटौती के साथ-साथ कुछ मुद्दे, मकसद और मंतव्य भी साझा होंगे। प्रदेश को पंचायती राज से समझने की कवायदें काफी पुरानी हैं और इस लिहाज से इनके साथ शहरी मसलों का समावेश राजनीतिक दृष्टि का व्यापक नजारा बन सकता है। अमूमन यह देखा गया है कि हिमाचली परिदृश्य में राजनीति अपने भीतर तक जागरूक समाज को इंगित करती है, इसलिए एक साथ चुनाव की स्थिति में परीक्षा और कठिन हो सकती है या सत्ता के साथ स्थानीय निकायों का अभिप्राय जुड़ जाएगा। प्रदेश में पंचायत, नगर परिषद व नगर निगम चुनावों के बीच स्पष्ट समयावधि का अंतर स्थानीय स्तर तक विकास को प्रभावित करता है। अतः एक ही वक्त पर चुनाव की सूई को खड़ा करने के अभियान में पंचायतों के साथ तमाम नगर निकायों की अवधि समाप्त करनी पड़ेगी। नगर परिषदों-पंचायतों तथा नगर निगमों की अवधि कम से कम एक साल से तीन साल तक पहले ही समाप्त करनी होगी। अगर ऐसा होता है तो इस फैसले की आंच में राजनीतिक समीकरण नए सिरे से लिखे जाएंगे। वैसे भी राज्य की नई सत्ताओं का टकराव हमेशा स्थानीय निकायों से रहता है और आरोप-प्रत्यारोप में समय गुजरता है या सरकार के प्रभाव में पाले बदले जाते हैं। सत्ता परिवर्तन से शहरी निकायों में अस्थिरता का माहौल अनेक कारणों से अनुपयोगी सिद्ध होता रहा है, नतीजतन हिमाचल का शहरी विकास पूर्ण रूप से संबोधित ही नहीं हो पाया। सरकारों की निरंतरता में यह आवश्यक है कि गांव, देहात से शहर तक मजमून एक साथ संबोधित हों, लेकिन इसके विपरीत राज्य सत्ता के नए निजाम आते ही सारी परिस्थितियों को अपने अनुकूल करने में जुट जाते हैं। अविश्वास प्रस्तावों की भूमिका में करवटें सारे माहौल को रूखा बना देती हैं। इसीलिए आर्थिक कंगाली का असर भले ही पंचायत प्रणाली में नजर नहीं आता, लेकिन शहरी व्यवस्था में चुनावी कसरतों ने वैमनस्य की हदें पार की हैं। ऐसे में चुनाव की हर पायदान के बाद आर्थिक पारदर्शिता पर राजनीतिक कोहरा बढ़ जाता है। नगर निगम चुनावों तक तो सियासी कौशल का शीर्षासन सीधे-सीधे टकराव पर आमादा हो जाता है। चाहे वर्तमान में हिमाचल केवल दो नगर निगमों पर चुनावी नजर रखता हो, लेकिन ये दोनों सीधे-सीधे विधानसभा चुनाव का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बन जाते हैं। ऐसे में शहरी निकायों की दृष्टि से चुनावी कवायद में अगर परिवर्तन आता है, तो इससे सियासी खेल की एक ही पारी साबित होगी। देखना यह भी होगा कि हिमाचल सरकार किस तरह नई परिपाटी स्थापित करती है तथा इसकी शुरुआत में ही किन शर्तों और वादों पर गौर होता है। राजनीतिक सहमति के बिना आदर्शों की बात बेमानी है, लिहाजा वे अर्थ भी ढूंढे जाएंगे, जिनके अंतर्गत एक साथ चुनाव का आधार पेश करने की कोशिश हो रही है। निश्चित तौर पर एक साथ चुनाव की पहली रूपरेखा में एक तरह से राज्य की राजनीतिक समीक्षा भी होगी और ढांचागत सुधार की परिकल्पना में विवेचन शुरू होगा। हिमाचल में पंचायती राज संस्थाओं से शहरी निकायों तक बिखरे स्थानीय मुद्दों, अपेक्षाओं और विकास गतिविधियों को अगर सुशासन मिले, तो राज्य के संसाधनों के किफायती तथा सही इस्तेमाल की उम्मीद बढ़ सकती है। ऐसा भी समझा जा सकता है या यह अपरिहार्य हो चुका है कि पंचायती राज तथा शहरी प्रबंधन के नए दबावों के मद्देनजर कानूनों तथा नियमावलियों को भविष्य के परिप्रेक्ष्य में बदला जाए। गांव की सरहद तक पहुंचे आधुनिक विकास ने परिस्थितियां तथा पारिस्थितिकीय दशा जिस तरह बदली है, उससे चुनौतियों की फेहरिस्त लंबी हो जाती है। खासतौर पर शहरी और पर्यटन विकास का दबाव रेखांकित हो रहा है और इसी के साथ राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल के दिशा-निर्देश स्पष्ट हो रहे हैं। बेशक सरकारी तौर पर निचले स्तर की चुनावी व्यवस्था एक रूप में समाहित हो सकती है, लेकिन जनप्रतिनिधियों की आजमाइश जब तक सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करती, चुनावी रोकड़े में बिकती नैतिकता को बचाना कठिन होता रहेगा। समाज की भी जिम्मेदारी है कि लोकतंत्र की जमीनी हकीकत को दुरुस्त करने के लिए पंचायती राज तथा शहरी संस्थाओं को नेक हस्तियों के स्पर्श से चलाए।