Tuesday, October 15, 2019 02:26 PM

और कितना इंतजार…

सुरेश सेठ

साहित्यकार

इस देश के भाग्य में इंतजार लिख दिया गया है। हम सब हैं ही, अच्छे दिनों के आने की इंतजार की प्रतीक्षा सूची में। अभी खबर मिली है कि इस देश का लगभग हर सपना जीवी इनसान बेहतर दिनों की तलाश में विदेश पलायन कर जाने की अंतहीन कतार में बरसों से खड़ा है। अगर ईमानदारी से इस कतार में खड़े होकर अमरीका में जाकर बसने का ग्रीन कार्ड प्राप्त करना है, तो इसमें एक सौ इक्यावन वर्ष लगेंगे। एक आदमी की औसत आयु निकालने वाले आंकड़ा शास्त्री उसे सत्तर बरस बताता है। इसका अर्थ यह हुआ कि एक आम आदमी को इस देश से कानूनी तरीके से ग्रीन कार्ड को हासिल करने के लिए दो जिंदगी जमा दस वर्ष चाहिए। अब बताइए, ‘भला कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ  के सर होने तक’ इसलिए हर शहर में कबूतरबाजों के कुनबे पनपने लगे हैं। ये अपने अवैध पंखों पर सवार करवा के इन दिवा स्वप्नशील प्रतीक्षा ग्रस्त नौजवानों को विदेशी धरती तक पहुंचाते हैं। अपने विरसे का सब जमा जत्था बेचकर इन्हें इन अवैध पंखों पर सवारी मिलती है। उम्मीद उड़ान भर कर न्यूयार्क पहुंच जाने की होती है, लेकिन अभागा भगोड़ों की तरह टिंबकट के जंगलों में उतार दिया जाता है। उम्मीद लक दक चमकदार बड़ी गाडि़यों और ऊंचे फ्लैटों में जीने की होती है, तोहफा मिलता है तेल देशों में दोयम दर्जे की नागरिकता का या औरत हो तो शेखों के हरमो में यौन शोषण का। मर्द हो तो उनके दड़बो में कैद हो उनकी ठोंकरों से लेकर कोड़ों के बरसने का। बेशक एक गुमनाम, दोयम दर्जे की जिंदगी उसके इस प्रमाण के बाद उसका इंतजार करती है। पलायन करने वाला डरे, तो चचा हंस कर उसे समझाते हैं कि इस देश में तो तुम यह भी नहीं पाते। तुम्हें मिली है यहां सातवें दर्जे की नागरिकता की जिंदगी, जिसमें रोटी, कपड़ा, मकान, रोजी रोजगार के वायदे हैं, जो नेताओं के भाषणों में से उभरते हैं और हवा में जुमले बन दम तोड़ देते हैं। हर सर को छत का वायदा बार-बार दोहराया जाता है, लेकिन भू-माफिया द्वारा खड़े किए गए बहु-मंजिलें भवनों के पिछवाड़े दम तोड़ देता है। हम गए थे वहां उन दम तोड़ते सपनों की खोज खबर लेने, लेकिन वहां कोई राजू डफली वाला हमें दिल का हाल सुने दिल वाला गाकर नाचता हुआ दिखाई नहीं दिया। जब मसीहाओं ने अपने दिल की जगह सोने की ईंटें लगा लीं, तो भला बताओ तुम्हारा हाल उन तक पहुंचेगा कैसे? तुम तो सात समुद्र पार के लोगों को अपना हाल सुनाने के लिए एक चरमराती हुई नौका में ठुस गए थे। तूफानी थपेड़ों का आघात न सह सकी, वह माल्टा के पास आगाध जल राशि में डूबी। लेकिन केवल एक बार नहीं। यहां बरमूडा त्रिकोण जैसे हम समुद्र में माल्टा उभरते हैं और नौजवानों से भरी नौकाएं डूबती रहती हैं। लेकिन डूबते नौजवानों की हृदय विदारक चीखें कौन सुनता है? एक नौका डूबती है, और दूसरी नौका के लिए सपना जीते युवक कतार लगाए खड़े मिलते हैं। क्या हुआ जो सपने टूट गए? लोगों को तो इनके टूटने की आदत हो गई है।