कब ध्वस्त होंगे छद्म देव आस्था के मिथक

राजेंद्र राजन

लेखक साहित्यकार हैं

इस अत्यंत शर्मनाक घटना के बाद सरकार, प्रशासन, पुलिस व नेताओं का सक्रिय होना इस बात का संकेत है कि जब तक मीडिया संज्ञान न ले, पंचायत प्रतिनिधि व पुलिस मौन साधे रखेंगे। सात नवंबर को पीडि़त महिला ने अपनी प्रताड़ना के विरुद्ध पुलिस से शिकायत की, लेकिन इस उम्रदराज महिला की पीड़ा से पुलिस कतई नहीं पसीजी। पुलिस की कार्यप्रणाली व उसका चेहरा देश भर में एक जैसा ही है। हिमाचल में गुडि़या कांड में संलिप्त कुछ पुलिस वाले आज भी सलाखों के पीछे हैं। दिल्ली में वकीलों के हाथों पिटने के बाद पुलिस आंदोलन तो करती है लेकिन समाज के प्रति अपनी संवेदनशीलता के बारे में कोई सबक नहीं लेती। राजदेई के विरुद्ध इस शर्मनाक घटना ने  सभ्य समाज की आत्मा को झकझोरा है, तो देव परंपरा व देव आस्था से जुड़े उन लोगों को भी बेनकाब किया है जो धर्म व आस्था के नाम पर जनमानस की भावनाओं से खेलते हैं...

सरकाघाट उपमंडल के गाहर गांव में 80 वर्षीय राजदेई को डायन बताकर क्रूरता व प्रताड़ना की घटना एक ऐसा कलंक है जिसने मानवता को झकझोर दिया है। छह नवंबर को देवता परिवार से जुड़े लोगों ने इस बुजुर्ग को डायन बताकर उसके मुंह पर कालिख पोती और जूतों की माला पहनाकर उसे गांव में घुमाया। हर बार की तरह तमाशबीन मूक रहे और वीडियो बनाते रहे। यानी भीड़ में शामिल लोगों ने कोई विरोध नहीं किया, न ही इस निःसहाय व अक्षम महिला के पक्ष में आवाज बुलंद की। अगर यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल न होती तो इस वृद्धा पर जुलमों-सितम की दास्तान गाहर गांव की हदों में ही गुम होकर रह जाती। इस अत्यंत शर्मनाक घटना के बाद सरकार, प्रशासन, पुलिस व नेताओं का सक्रिय होना इस बात का संकेत है कि जब तक मीडिया संज्ञान न ले, पंचायत प्रतिनिधि व पुलिस मौन साधे रखेंगे। सात नवंबर को पीडि़त महिला ने अपनी प्रताड़ना के विरुद्ध पुलिस से शिकायत की, लेकिन इस उम्रदराज महिला की पीड़ा से पुलिस कतई नहीं पसीजी। पुलिस की कार्यप्रणाली व उसका चेहरा देश भर में एक जैसा ही है। हिमाचल में गुडि़या कांड में संलिप्त कुछ पुलिस वाले आज भी सलाखों के पीछे हैं। दिल्ली में वकीलों के हाथों पिटने के बाद पुलिस आंदोलन तो करती है लेकिन समाज के प्रति अपनी संवेदनशीलता के बारे में कोई सबक नहीं लेती। राजदेई के विरुद्ध इस शर्मनाक घटना ने  सभ्य समाज की आत्मा को झकझोरा है, तो देव परंपरा व देव आस्था से जुड़े उन लोगों को भी बेनकाब किया है जो धर्म व आस्था के नाम पर  जनमानस की भावनाओं से खेलते हैं। 85 प्रतिशत साक्षरता दर पर गर्व करने वाले हिमाचल के समाज के कुछ लोग आज भी आदिम युग में जी रहे हैं और अंधविश्वासों, रूढि़यों व अर्थ खो चुकी परंपराओं को जीवित रखने के वास्ते देव परंपरा के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं। यह बात चकित करने वाली  है कि  स्थानीय स्तर पर देवताओं के प्रति लोगों का अगाध लगाव होता है और वे उनके सुख-दुख में हमेशा साथ बने रहते हैं। यानी देवता रक्षक की भूमिका में महत्त्वपूर्ण भूमिका का परिचायक है, लेकिन गूर और देव परंपराओं के संचालन के लिए जिम्मेदार लोग देवता का छद्म भय दिखाकर लोगों की आस्था से बेजा खिलवाड़ भी करते देखे गए हैं। हाशिए पर सिमटे समाज, खासकर दलित, पिछड़े व गरीब लोगों के विरुद्ध देव परंपरा के अत्याचार आम हैं। स्वर्ण जाति के मंदिरों में ऐसे लोगों का प्रवेश अब भी वर्जित है। देवताओं के चेलों, गूर आदि द्वारा सुनाए जाने वाले फरमान अकसर सामंती सोच का सूचक बनते हैं। देव आस्था के नाम पढ़ा लिखा समाज भी अंधा होकर देव परंपराओं का निर्वहन करने को बाध्य है। क्योंकि यह व्यवस्थाएं सच व झूठ में फर्क करने के विवेक को समाप्त कर देती हैं। यह जानते व समझते हुए कि धातु या पत्थर की बेजान मूर्तियां विज्ञान के युग में किसी जादू की तरह प्रकट होकर कोई चमत्कार नहीं कर सकतीं, ये तथाकथित चमत्कार गूर या चेले ही करते हैं। जिन्हें लोग साक्षात ईश्वर का अवतार मानकर उनके हर गलत व सही फैसले को अंगीकार करने के लिए तत्पर रहते हैं। राजदेई की प्रताड़ना के पीछे अवश्य व्यक्तिगत हित साधने के प्रयास रहे होंगे। वरना दो दर्जन से अधिक लोग हवालात में न होते। वैसे ऐसे अत्याचारी लोगों का सामाजिक बहिष्कार जरूरी है ताकि वे किसी भी महिला या पुरुष की अस्मिता को तार-तार करते वक्त लाख बार सोचें। राजदेई की घटना के बाद मुझे यशपाल की एक कहानी ‘डायन’ का स्मरण हो आया। कोई 70-80 साल पहले रचित यह कहानी बहुपति प्रथा का विरोध करने वाली लड़की पर केंद्रित है, जो घोर प्रताड़ना के बाद झरने में कूदकर जान दे देती है, लेकिन परिवार यह प्रचारित करता है कि वह तो डायन थी, तभी तो मरी। हिमाचल में महिला अधिकारों की जंग मीडिया की सुर्खियां बनती हैं, तो  ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का आंदोलन भी चल रहा है। ऐसे में राजदेई के विरुद्ध हुई ऐसी घटना से हमें सबक लेने की जरूरत है। सुखद स्थिति यह है कि इस घटना का नोटिस महिला आयोग व हिमाचल हाईकोर्ट ने भी लिया है व स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश जारी किए हैं। पुलिस प्रशासन और समाज छद्म देव आस्था के नाम पर भले ही कबूतर की तरह आंखें मूंदे बैठे हों, न्यायिक संस्थाएं ऐसी घटनाओं के प्रति सजग हैं।  प्रश्न यह है कि किसी बेसहारा, अक्षम या लाचार व्यक्ति के विरुद्ध जब क्रूरता या उत्पीड़न की घटनाएं होती हैं, तो सभ्य, जागरूक व शिक्षित समाज क्यों चुप्पी साधे रखता है। धार्मिक आस्थाओं के प्रति अंधभक्ति व विश्वास के मिथक को ध्वस्त करना अति आवश्यक है। राजदेई के विरुद्ध हुई शर्मनाक घटना की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए सरकार, पुलिस प्रशासन का दायित्व तो है ही, आमजन की जागरूकता और विरोध भी बेहद जरूरी है।

हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे।

-संपादक