कभी झूठ मत बोलो

कहानी

मैं बचपन से ही साइकिल बहुत तेज चलाया करता था। जिसकी वजह से मैं अकसर किसी न किसी को ठोकर मार दिया करता था। एक रोज ऐसा हुआ कि बाजार से घर लौटने पर उबड़-खाबड़ सड़क पर तेजी गति से साइकिल चलाने के नतीजे में साइकिल का फ्रेम टूट गया और मैं असंतुलित होकर गिर पड़ा, लेकिन ऊपर वाले का शुक्र था कि मैं बच गया। अलब्बता घर पहुंचने के पश्चात चचाजान से मेरा बच पाना मुश्किल था। क्योंकि वह बड़े सख्तमिजाज के थे। परिवार के दूसरे बच्चों के अलावा मेरी गतिविधि पर भी उनकी पैनी नजर रहती है। हां, अब्बू सामान्य स्वभाव के थे और दूसरे शहर में नौकरी करते थे। छुट्टियां बिताने, जब वह घर आते, तो हमारी छोटी-छोटी शररातों पर खास तवज्जो नहीं देते थे। जब मैं टूटी हुई साइकिल को किसी तरह ढोते हुए घर पहुंचा, तो उनके सामने क्या सफाई पेश करूंगा। अम्मी और घर के दूसरे लोगों से तो साफ झूठ बोलकर उनके विश्वास और सहानुभूति को आसानी से बटोर ली कि किसी बाइक सवार ने ठोकर मार दी, लेकिन चचाजान के सामने अपने झूठ पर पर्दा कैसे डाल सकूंगा? उन्हें तो कभी-कभी मेरी सच्चाई पर भी जल्दी यकीन नहीं आता। फिर मेरे सफेद झूठ पर वह कैसे यकीन कर लेंगे?

मैं दुविधा में पड़ गया। इसी बीच एक तरकीब सूझी। मैंने दुकान से एक ब्लेड खरीदी। और सड़क के किनारे एकांत में खड़े होकर मन को कठोर करते हुए अपने हाथ-पैर को मामूली रूप से घायल कर लिया। फिर दुखी चेहरा बनाए कराहते हुए घर पहुंचा। अम्मी की नजर जैसे ही मेरे घायल शरीर पर पड़ी, वह तड़फ उठीं और रोने लगीं। मेरी और साइकिल की दुर्दशा देखकर घर के सभी लोगों को यकीन हो गया था कि मैं बाजार में ठोकर खा गिर गया हूं। अलबत्ता चचाजान मुझे अजीब नजरों से लगातार घूर रहे थे। ये सब कैसे हुआ? उनकी आवाज में जबरदस्त झुंझलाहट थी। मैं जवाब में फर्जी घटना का सारांश बताने लगा। तुम सरासर झूठ बोल रहे हो। अब चचाजान जोर से गरज पड़े। इस पर मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। मेरे प्रति चचाजान का यह व्यवहार अम्मी को सख्त नागवार लगा। उन्होंने चचाजान को आड़े हाथों लेते हए कहा मुख्तार तुम मेरे बच्चे के चचाजान हो, या दुश्मन…? जब देखो बेचारे को बात-बात पर गुस्सा करते रहते हो। मैंने माना कि यह झूठ बोल रहा होगा, लेकिन इसकी जख्मी हालत और टूटी हुई साइकिल आखिर क्या कह रही है। देखिए भाभी आप बिलकुल खामोश रहें तो बेहतर है, वरना ठीक नहीं होगा। क्योंकि आपके ही लाड़ प्यार ने इसे कौड़ी का तीन कर दिया है। मैं इसकी रग-रग से वाकिफ हूं। यह लड़का एक नंबर का बदमाश और झूठा है। चचाजान को मैंने अम्मी से इस बेरुखी से पेश आते देखा तो, मुझे काफी तकलीफ पहुंची। मन में आया कि चचाजान को बोलूं, आप मेरी अम्मी से तमीज से पेश आएं। वह आप से बड़ी हैं, लेकिन ऐसा करने का मैं साहस नहीं जुटा पा रहा था। मेरा दिल कैसे -कैसे तो कर रहा था।  बेटा तुझे मेरी कसम, जो सच है वही बता।  अम्मी ने मेरा हाथ अपने सिर पर रखकर मुझे धर्मसंकट में डाल दिया था। क्योंकि मेरे सच बोलने पर यह निश्चय था कि चचाजान अम्मी पर और हावी जाना था, जबकि अब मैं किसी भी कीमत पर अम्मी को और अपमानिक होते देखना बर्दाश्त नहीं कर सकता था और न ही उनके विश्वास का खून करना चाहता था। इसलिए न चाहते हुए भी मुझे अम्मी के सिर पर अपने कांपते हाथ रखकर एक बार फिर झूठी कसम खानी पड़ी और सख्त अजाब मोल लेना पड़ा।  अम्मी जान को सिर पर हाथ रखकर मुझे झूठी कसम खाते देख चचाजान गुस्से से लाल हो उठे, साथ ही वह मुझे घूर भी रहे थे। मैं उनकी मनोस्थिति अच्छी तरह समझ रहा था। मैं यह भी समझ गया था कि चचाजान मेरी असलियत अच्छी तरह जान रहे हैं। अम्मी की निगाह में चचाजान को झूठा साबित करना… और चचाजान की नजर में मेरा गिर जाना, यह दुख मुझे हमेशा परेशान करेगा। इसी के साथ बाजार से घर तक के उस सफर ने मेरे एहसास को ऐसा झिंझोड़ा कि मैं केवल जमीनी सफर ही नहीं, बल्कि वैचारिक एवं व्यावहारिक सफर भी होशमंदी से करने का अभ्यस्त हो गया हूं। इसलिए बच्चों झूठ कभी हमें ऐसे धर्मसंकट में डाल देता है कि हमें जिंदगी भर इस बात पछतावा रहता है। इसलिए हो सके तो कभी झूठ न बोलें, और अपने माता-पिता से तो कभी नहीं।

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