Tuesday, October 15, 2019 03:25 PM

‘करने’ और ‘होने‘ का फर्क

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

मुझे ‘हाउ टु मेक फ्रेंड्स एंड इंफलुएंस पीपल’ का हिंदी अनुवाद ‘लोक व्यवहार’ पढ़ने को मिली। मेरे जीवन पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव रहा है और मेरी सफलता में इस पुस्तक की शिक्षा का भी योगदान रहा है। मेरे बड़े भाई राम कृष्ण खुराना ने मेरे पिता श्री के जीवन में घटी एक सच्ची घटना को बयान करते हुए एक कहानी लिखी और वह दैनिक हिंदुस्तान में छप गई तो वे लेखक बन गए। उनकी प्रेरणा से मुझे भी लेखक बनने का शौक चर्राया और मेरी कविताएं, कहानियां भी अखबारों में छपने लग गईं...

मैं किशोर वय का था जब मुझे स्वर्गीय संत राम द्वारा अनुदित और विश्व प्रसिद्ध लेखक डेल कार्नेगी द्वारा लिखित पुस्तक ‘हाउ टु मेक फ्रेंड्स एंड इंफलुएंस पीपल’ का हिंदी अनुवाद ‘लोक व्यवहार’ पढ़ने को मिली। मेरे जीवन पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव रहा है और मेरी सफलता में इस पुस्तक की शिक्षा का भी योगदान रहा है। मेरे बड़े भाई राम कृष्ण खुराना ने मेरे पिता श्री के जीवन में घटी एक सच्ची घटना को बयान करते हुए एक कहानी लिखी और वह दैनिक हिंदुस्तान में छप गई तो वे लेखक बन गए। उनकी प्रेरणा से मुझे भी लेखक बनने का शौक चर्राया और मेरी कविताएं, कहानियां भी अखबारों में छपने लग गईं। उसके बाद संयोगवश हमें अंबाला छावनी स्थित कहानी लेखन विद्यालय के बारे में जानकारी मिली और फिर हमें विद्यालय के संस्थापक स्वर्गीय डा. महाराज कृष्ण जैन के दर्शनों का सौभाग्य मिला। डा. जैन ने भारतीय विश्वविद्यालयों से भी पहले पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से शिक्षा देना शुरू किया और भारतवर्ष में वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कहानी, लेख आदि लिखना सिखाना शुरू किया। डा. जैन भी डेल कार्नेगी से खासे प्रभावित थे और वे अपने विद्यार्थियों को अकसर ‘लोक व्यवहार’ उपहार स्वरूप दिया करते थे। एक बार एक ग्रामीण अंचल से आए एक सज्जन ने भी जब कहानी लेखन महाविद्यालय से कहानी लिखना-सीखना शुरू किया तो वे डा. जैन से मिलने आए और डा. जैन ने उन्हें भी ‘लोक व्यवहार’ उपहार स्वरूप दी।

कुछ माह बाद जब वे दोबारा डा. जैन से मिलने आए तो संयोगवश मैं भी डा. जैन के पास बैठा हुआ था। डा. जैन ने उत्सुकतावश उनसे पूछा कि उन्होंने ‘लोक व्यवहार’ पढ़ी या नहीं तो उन सज्जन का जवाब सुनकर मैं चकरा गया। उन्होंने बहुत सहजता से कहा कि यह किताब तो ‘चालाकियों’ से भरी हुई है। उस समय मैं उनकी बात का मतलब समझ तो पाया पर उसने मेरी विचारधारा में कोई परिवर्तन नहीं किया। समय बीता और मुझे कई और किताबें पढ़ने और उनसे सीखने का मौका मिला। जापानी मूल के अमरीकी लेखक राबर्ट कियोसाकी की पुस्तकों ‘रिच डैड, पुअर डैड’, ‘कैशफ्लो क्वाड्रैंट’ और ‘हम आपको अमीर क्यों बनाना चाहते हैं’? ने मेरी सोच को एक नई दिशा दी। संपन्न और आरामदायक जीवन जीते हुए राबर्ट कियोसाकी जब मोटे हो गए तो उन्होंने अपनी मानसिकता बदली और शीघ्र ही उन्होंने वजन घटा लिया। उनके मित्रों और प्रशंसकों ने जब उनसे पूछा कि वजन घटाने के लिए उन्होंने क्या किया, यानी किस तरह की डाइटिंग की, किस तरह के व्यायाम किए तो उन्होंने जवाब दिया कि हमें यह समझना चाहिए कि परिवर्तन दिमाग से शुरू होते हैं, या यूं कहें कि दिमाग में शुरू होते हैं। जब मैं मोटा हो गया था और मैंने अपना वजन घटाने का निश्चय कर लिया तो मैं जानता था कि मुझे अपने विचार बदलने थे और सेहत के बारे में खुद को दोबारा शिक्षित करना था। इसलिए मैंने जो किया वह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि मैंने अपनी सोच को बदला। यही कारण था कि मैं न केवल वजन घटा सका, बल्कि उसे दोबारा बढ़ने से भी रोक सका। ‘करने’ और ‘होने’ के अंतर का यह बेहतरीन उदाहरण था कि खान-पान बदलने और व्यायाम शुरू करने से पहले राबर्ट कियोसाकी ने अपनी सोच को बदला। राबर्ट कियोसाकी के इस अनुभव का जिक्र मैंने बहुत वर्ष पहले भी किया था, लेकिन कहानी लेखन महाविद्यालय में उस ग्रामीण सज्जन द्वारा डेल कार्नेगी की पुस्तक को ‘चालाकियों’ से भरी हुई बताने और लेखों में राबर्ट कियोसाकी का उदाहरण देने के बावजूद मैं खुद ‘करने’ और ‘होने’ के अंतर को अपने जीवन में नहीं उतार पाया था।

कुछ समय पूर्व जब मैं एक कार्यशाला में था तो एक चमत्कार की तरह ‘करने’ और ‘होने’ के अंतर मुझे न केवल पूरी तरह से समझ में आया बल्कि मेरी सोच बदली और अब यह मेरे जीवन में उतर गया है। यदि हमें किसी व्यक्ति से कोई काम लेना हो तो हम बहाने ढूंढ-ढूंढ कर उसकी प्रशंसा करते हैं, दरअसल वह प्रशंसा नहीं होती बल्कि वह चापलूसी है क्योंकि हम स्वार्थवश ऐसा कर रहे हैं। सामने वाला वह व्यक्ति हमें अच्छा लगे या न लगे, हम उसकी बड़ाई इसलिए करते हैं क्योंकि हमें उससे अपना कोई काम निकलवाना है। जब हम अपनी मानसिकता बदल लेते हैं और यह समझ लेते हैं कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति शत-प्रतिशत आदर्श व्यक्ति नहीं है, उसी तरह जिस तरह हम भी शत-प्रतिशत आदर्श व्यक्ति नहीं हैं और हम में भी कई कमियां हैं। जब हम लोगों को और उनकी कमियों को उसी रूप में स्वीकार करना आरंभ कर देते हैं, जब हम उनकी तथाकथित कमियों के बावजूद उनसे प्रेम करने की भावना विकसित कर लेते हैं, तो हमने अपनी सोच को बदलाए सोच को परिष्कृत किया और हम एक बेहतर इनसान बन गए। यह सिर्फ  ‘करना’ नहीं है, ‘होना’ है, ‘हो जाना’ है, यह परिवर्तन है और स्थायी है। जब आपके दिल और शब्दों में सीधा संबंध होता है तो आप दिखावा नहीं कर रहे होते, आपकी जुबान आपके दिल की बात कहती है, आप सिर्फ  अच्छे  दिखते नहीं, सिर्फ  अच्छे काम करते नहीं, बल्कि मन से, आत्मा से भी अच्छे हो जाते हैं। ‘करने’ और ‘होने’ का यह अंतर हमारा जीवन ही बदल देता है। आज हमें ‘फ्लाई अनलिमिटेड वर्ल्डवाइड’ के ‘एचएचपीपी’ फार्मूले को समझने की आवश्यकता है जो हमें हैल्दी, हैपी, पीसफुल और प्रासपेरस, यानी स्वस्थ, खुश, शांत और समृद्ध होने की राह दिखाता है, वरना यह भी जाना-माना सच है कि बहुत से अमीर लोग, सफल दिखने वाले लोग भी अपने जीवन में इतने परेशान होते हैं कि आत्महत्या तक का खतरनाक कदम उठा लेते हैं, और दुनिया को तब पता चलता है कि सफल दिखने वाला व्यक्ति असल में खुद कितना दुखी था। आज हम सबको स्वस्थ, खुश, शांत और समृद्ध बनने के ‘एचएचपीपी’ फार्मले पर अमल करने की आवश्यकता है। आमीन।’’’ 

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