कर्नल मनीष धीमान

स्वतंत्र लेखक

सेना में राशन

भारतीय सेना में बनाए गए नियम, कानून, रस्म, तरीके सालों के तजुर्बे और कड़ी कसौटी पर जांच-परख एवं समीक्षा कर प्रयोग में लाए गए हैं। ज्यादातर हमारी सेना के सैनिकों का रहन-सहन, खान-पान, दिनचर्या या दूसरे शब्दों में कहो तो सारा सिस्टम अभी भी उसी तरह चल रहा है जैसा अंग्रेजी सेना के दौरान था। समय-समय पर इस सिस्टम को बदलने की बात होती है, पर हर नियम को इतनी बारीकी से अध्ययन कर अमलीजामा पहनाया गया है कि इससे बेहतर तरीका मिल पाना मुश्किल होता है। ऐसी ही एक कोशिश में 2017 में सेना अफसरों को पीस स्टेशन पोस्टिंग के दौरान राशन न देकर राशन मनी या राशन अलाउंस देने का फैसला लिया गया। बाबुओं का कहना था कि इससे भ्रष्टाचार कम और सेना बजट से अमाउंट सरप्लस होगी जिसको किसी दूसरी जगह पर इस्तेमाल किया जाएगा। राशन अलोउंस के नाम पर दिया जाने वाला दैनिक भत्ता, जेल में कैदियों को दिए जाने वाले दैनिक खर्चे  से भी कम था। सेना में दबी जुबान में इसका विरोध जरूर हुआ, पर सैनिक धर्म निभाते हुए इसे स्वीकार कर लिया गया। मात्र दो वर्ष में ही हर दावा टांय- टांय फिस्स हो गया। न तो सैनिक बजट से कोई अमाउंट सरप्लस हुई, न ही कोई और फायदा दिखा, अंततः सरकार ने इस पर मल्टीपल कमेटियां बना, गहन मंथन कर  जून 2019 में पीस स्टेशन में पोस्टिड अधिकारी को पहले जैसे राशन देने का फैसला किया। फौज में एक फिक्स क्वांटिटी  ड्राई और फै्रश राशन के रूप में दी जाती है, ड्राई राशन में दाल-चावल आदि जो 15 दिन में और फे्रश राशन में फल, सब्जी, दूध, अंडा आदि जो सप्ताह में तीन बार इशू किया जाता है। पीस स्टेशन में पोस्टिंग का मतलब यह कतई नहीं कि इसमें अधिकारी सिर्फ  9:00 से 5:00 बजे तक आफिस जाएगा और बाकी समय बाजार से सब्जी लाने और निजी काम करेगा जैसे ज्यादातर सिविल की नौकरी करने वाले करते हैं। पीस स्टेशन पर भी फौजी दिनचर्या में कोई खास बदलाव नहीं होता। सुबह 5:00 बजे पीटी परेड, फिर आफिस और शाम को गेम्स परेड और सप्ताह में कम से कम दो बार नाइट परेड। यह जरूरी नहीं है कि फौजी लोकेशन किसी शहर या कस्बे के नजदीक हो, कुछ कंटोनमेंट एरिया ऐसी जगह पर भी होते हैं जहां पर मार्केट की सुविधा बहुत कम होती है। पीस स्टेशन पोस्टिंग के दौरान अधिकारी संस्था की जरूरत के हिसाब से समय-समय पर अलग-अलग जगहों पर सैनिकों की टुकड़ी के साथ कैंप ट्रेनिंग, युद्ध अभ्यास एवं राष्ट्रीय आपदाओं के वक्त बचाव कार्य के लिए जाते रहते हैं। ऐसे में अधिकारी को अपना राशन खरीदना समय की बर्बादी और दिए गए काम या लक्ष्य को पूरा करने में रोड़ा साबित होता है। इसमें दोराय नहीं कि फौज में बहुत सारे पुराने ढर्रे से चले ऐसे कानून हैं जिनको बदलने की जरूरत है, पर इनको एसी रूम में बैठकर नहीं बल्कि ग्राउंड पर समीक्षा कर गहन मंथन के बाद उचित निर्णय लेना होगा।

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