Monday, August 26, 2019 08:33 AM

कर्नाटक का कड़वा सच

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

देश के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि विधानसभा के दस सदस्य उच्चतम न्यायालय में जाकर फरियाद लगा रहे हैं कि उनका त्यागपत्र स्वीकार किया जाए। उधर विधानसभा के अध्यक्ष हैं कि जब सदस्य त्यागपत्र देने उनके कार्यालय में जाते हैं, तो वह हड़बड़ी में भाग लेते हैं। वह इतने दिनों से इसी गहन अध्ययन में डूबे हुए हैं कि किसी सदस्य का विधानसभा से इस्तीफा कैसे स्वीकार किया जाए? सदस्य स्वयं उनके हाथ में त्यागपत्र दे देता है, लेकिन अध्यक्ष को फिर भी उसका गहरा अध्ययन करना है। यह इस्तीफा स्वीकारने का इतालवी तरीका हो सकता है...

जब कर्नाटक में पिछले विधानसभा चुनाव हुए थे, तो वहां सोनिया गांधी और राहुल गांधी की पार्टी की सरकार थी, लेकिन चुनाव होने पर 224 सदस्यों वाली प्रदेश विधानसभा में यह पार्टी केवल अस्सी सीटें हासिल कर पाई। जाहिर है प्रदेश की जनता ने इस पार्टी को सरकार से दूर रहने का जनादेश दिया। वैसे भी अस्सी सदस्यों के बलबूते वह सरकार बना भी नहीं सकती थी। सरकार बनाने के लिए जो दूसरी पार्टी मैदान में थी, वह पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के परिवार की जेडीएस है। उसे कुल मिलाकर पैंतीस सीटें हासिल हुईर्ं। पैंतीस सीटों के बलबूते कोई मुख्यमंत्री बन सकता है, ऐसा विश्वास देवेगौड़ा को स्वयं भी नहीं था। भारतीय जनता पार्टी को एक सौ पांच सीटें मिली थीं। जाहिर है कि चाहे गणितीय पद्धति से न सही, लेकिन व्यावहारिक पद्धति से कर्नाटक की जनता ने भाजपा को सरकार बनाने का जनादेश दिया था, लेकिन सोनिया की पार्टी का मानना था कि जनता की ऐसी-तैसी भाजपा को सरकार नहीं बनाने देंगे। इसलिए उसने एक ऐसा दांव खेला, जिसकी आशा देवेगौड़ा और उनके बेटे को भी नहीं थी।

सोनिया की पार्टी ने देवेगौड़ा से कहा कि आपके विधायक चाहे पैंतीस ही हैं, लेकिन आपका बेटा मुख्यमंत्री बनने के लिए यदि तैयार हो जाए, तो हमारे अस्सी विधायक उसका समर्थन कर देंगे। राजनीति में ऐसी इतालवी विद्या देवेगौड़ा ने भी पहली बार देखी थी कि अस्सी सदस्यों वाला दल, पैंतीस सदस्यों वाले दल की ताजपोशी कर रहा हो और तोरणद्वार सजा रहा हो, परंतु  सोनिया गांधी को तो किसी भी हालत में राष्ट्रवादी शक्तियों के रथ को रोकना था। यदि जेडीएस न मिलती, तो शायद कांग्रेस के नए नायक टीपू सुल्तान के वारिसों की खोज की जाती। खैर सोनिया गांधी का सौभाग्य कि कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार हो गए। सोनिया को शायद आशा रही होगी कि सरकार के बलबूते अगले चुनाव जीत लेंगे और उससे राहुल गांधी के परिपक्व होने का सबूत भी मिल जाएगा। कांग्रेस वालों को लगता होगा कि अच्छे दिन आएंगे।

पिछले दिनों हुए लोकसभा के चुनावों में कर्नाटक की जनता ने सोनिया गांधी की इतालवी विद्या से अपमानित होकर  नया जनादेश दिया। राज्य की सत्ताइस लोकसभा सीटों में से पच्चीस सीटें भाजपा ने जीत लीं, लेकिन यह केवल कर्नाटक की कथा नहीं थी। भाजपा की इस सुनामी से देश की सभी पारिवारिक पार्टियों में कोहराम मच गया था। राहुल गांधी ने खुद ही इस्तीफा दे दिया। बाकी कांग्रेसी भी धड़ाधड़ इस्तीफा दे रहे हैं। देवेगौड़ा के आदमी और राहुल-सोनिया के आदमी, जो कर्नाटक में हैं, वे भला क्या देशभर में और दस जनपथ में चल रही इस हवा को सूंघ नहीं पा रहे? डूबते जहाज में, जिसका कप्तान ही भाग गया हो, भला कौन देर तक बैठा रहना चाहेगा। यही कारण है कि कर्नाटक में कांग्रेस व जेडीएस में त्यागपत्र देने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वहां की सरकार अल्पमत में आ गई है, लेकिन उस सरकार को बचाने के लिए विधानसभा के अध्यक्ष द्रविड़ प्राणायाम करते दिखाई दे रहे हैं। वे विधानसभा के इन सदस्यों का त्यागपत्र स्वीकार नहीं कर रहे। देश के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि विधानसभा के दस सदस्य उच्चतम न्यायालय में जाकर फरियाद लगा रहे हैं कि उनका त्यागपत्र स्वीकार किया जाए। उधर विधानसभा के अध्यक्ष हैं कि जब सदस्य त्यागपत्र देने उनके कार्यालय में जाते हैं, तो वह हड़बड़ी में भाग लेते हैं। वह इतने दिनों से इसी गहन अध्ययन में डूबे हुए हैं कि किसी सदस्य का विधानसभा से इस्तीफा कैसे स्वीकार किया जाए? सदस्य स्वयं उनके हाथ में त्यागपत्र दे देता है, लेकिन अध्यक्ष को फिर भी उसका गहरा अध्ययन करना है।

यह इस्तीफा स्वीकारने का इतालवी तरीका हो सकता है। सोनिया-राहुल की पार्टी आरोप लगा रही है कि भारतीय जनता पार्टी विरोधी दलों के सदस्यों को खरीद रही है या फिर इस काम में उन्हें प्रोत्साहन दे रही है, लेकिन शायद जो सदस्य अपनी पार्टी छोड़ कर भाग रहे हैं, वे पार्टी में सूखा पड़ जाने और अभी एक-दो दशक किसी प्रकार की बूंदाबांदी की भी आशा न होने के कारण उत्पन्न भय से ग्रस्त होकर खूंटे तुड़ा रहे हैं। उनको भगाने के लिए भाजपा की जरूरत नहीं, उसके लिए राहुल-गांधी ही काफी हैं। कांग्रेस की दुर्गति से घबरा कर जगह-जगह दरारें पड़ रही हैं। ध्यान रखना चाहिए कि  पारिवारिक पार्टियों के साथ लोग तब तक जुड़े रहते हैं, जब तक उन्हें आशा हो और गाहे-बगाहे उसका सबूत भी मिलता रहे कि पारिवारिक पार्टी का मुखिया उन्हें चुनाव जिता सकता है। जब उनको लगे कि मुखिया की अब वह औकात नहीं बची है कि वह उन्हें चुनाव की वैतरणी से पार लगवा दे, तब वे उस मुखिया व उस परिवार का साथ छोड़ देते हैं। कर्नाटक में यही हो रहा है।

सोनिया गांधी ने परिवार की विरासत अपने बेटे को सौंप दी थी। लोकसभा के चुनावों ने बता दिया कि जो अपनी परंपरागत सीट ही नहीं बचा पाया, वह पीछे मार्च प्लास्टिक करती फौज को कैसे जिता पाएगा? यह भावना केवल कर्नाटक में नहीं है, पूरे देश में है। यही कारण है कांग्रेस से भागने की होड़ केवल कर्नाटक में नहीं है, बल्कि गोवा, जम्मू-कश्मीर तक पहुंच चुकी है। हो सकता है कि भागने का यह खेल कल पंजाब, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी शुरू हो जाए, लेकिन कर्नाटक में अपने भाग रहे लोगों को रस्सी डालने के जो तरीके सोनिया-राहुल की पार्टी अपना रही है, उससे उनकी हताशा ज्यादा झलक रही है, सफलता कम।

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