Thursday, September 19, 2019 10:57 PM

कर्नाटक भी कांग्रेस मुक्त

कर्नाटक को लेकर लोकसभा में हंगामा किया गया, पर्चे हवा में लहराए गए। कांग्रेस लगातार आरोप की मुद्रा में थी कि पैसा और सरकारी ताकत के जरिए भाजपा कांग्रेस-जद (एस) विधायकों को डरा रही है और खरीद-फरोख्त भी जारी है। संसद में कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाया कि लोकतंत्र खतरे में है, लोकतंत्र को बचाओ। सवाल यह है कि कर्नाटक में लोकतंत्र को अपमानित किसने किया है? लोकतंत्र को खतरा किससे है? मुख्यमंत्री कुमारस्वामी की कैबिनेट के 31 मंत्रियों ने इस्तीफे दे दिए। अब बागी विधायकों को मंत्री पद का ‘लालच’ दिया जा रहा है। यह लिखने तक किसी भी विधायक ने बगावत वापस नहीं ली थी। दो निर्दलीय विधायकों-एच नागेश और आर शंकर ने गठबंधन छोड़ कर भाजपा को समर्थन देने की घोषणा की है। खुद मुख्यमंत्री ने दर्द झेलने की बात कही है और कई बार वह रो भी चुके हैं। क्या यह पीड़ा और रुदन भाजपा के कारण है या गठबंधन के अंतर्विरोधों के कारण है? कर्नाटक में हर तीन महीने के बाद सरकार और गठबंधन संकट में आते रहे हैं। क्या इसका ‘खलनायक’ भी भाजपा है? विधायकों के लिए बंगलुरू से कुछ दूर एक रिसॉर्ट में जद-एस ने 35 कमरे बुक कराए हैं। उनका प्रतिदिन  का किराया 9000 से 25,000 रुपए के बीच है। कांग्रेस के बागी विधायक मुंबई से गोवा चले गए हैं। डीके शिवकुमार बागियों को मनाने में लगे हैं, लेकिन बगावत का ऐयाश दौर जारी है। लोकतंत्र के अपहरण और संकट का यह दौर क्यों आया और उसका ‘प्रतिनायक’ कौन है? कांग्रेस के भीतर सिद्धारमैया, मल्लिकार्जुन खड़गे, जी.परमेश्वर आदि नेताओं के अलग-अलग गुट क्यों हैं और उनमें जंग क्यों जारी है? सिद्धारमैया और देवेगौड़ा की प्रतिद्वंद्विता भी पुरानी है। अलग-अलग नेताओं को वैकल्पिक मुख्यमंत्री बनाने के आग्रह बागियों की तरफ से क्यों किए जा रहे हैं? बेशक बदलते सियासी घटनाक्रम के मद्देनजर भाजपा की आंख भी कर्नाटक की सत्ता पर चिपकी है, क्योंकि वे भी ‘संन्यासी’ नहीं हैं। लेकिन सवाल यह होना चाहिए कि क्या कांग्रेस-जद (एस) का चुनावी जनादेश घोषित होने के बाद ही गठबंधन करना ‘स्वाभाविक’ और ‘प्राकृतिक’ था? क्या अब कर्नाटक भी कांग्रेस-मुक्त होने की मुद्रा में है? दरअसल इतिहास गवाह रहा है कि ऐसे गठबंधन या बाहरी समर्थन वाले तालमेल तोड़ना कांग्रेस की फितरत रही है। केंद्र में चौ. चरणसिंह की सरकार, चंद्रशेखर, देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल की सरकारें कांग्रेसी फितरत की पुख्ता नजीर रही हैं। कांग्रेस अपना स्वार्थ निकलने के बाद ऐसे ही सियासी खेल खेलती रही है। कर्नाटक में लोकसभा चुनाव जीतने का स्वार्थ था, लेकिन उसमें भी भाजपा स्विप कर गई। पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा तक चुनाव हार गए। जमीन पर कांग्रेस-जद (एस) गठबंधन चरितार्थ ही नहीं हो पाया। क्या यह फितरत लोकतंत्र के लिए खतरा करार नहीं दी जा सकती? अब कर्नाटक में सरकार कब तक है या कब उसका पतन होगा, उस पर निश्चित कुछ भी नहीं कहा जा सकता। एक विशेषाधिकार विधानसभा अध्यक्ष को है कि वह बागी विधायकों के इस्तीफे मंजूर करते हैं या कोई और निर्णय देते हैं। वैसे कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में लग रही है, लेकिन सदन के भीतर ही तय होगा कि सरकार के प्रति विश्वास है अथवा नहीं। यही सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है। बेशक कर्नाटक की जनता ने त्रिशंकु जनादेश दिया था, लेकिन उसका ज्यादा हिस्सा भाजपा की ओर था, क्योंकि 104 विधायकों के साथ वह सबसे बड़ी पार्टी थी। भाजपा नेता येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिलाई गई, लेकिन वह बहुमत का पूरा जुगाड़ नहीं कर पाए। विकल्प के तौर पर दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस ने सबसे कम सीटों पर विजयी जद-एस के नेता को मुख्यमंत्री बनाना तय किया। नतीजतन यह मौकापरस्त गठबंधन बना और कुमारस्वामी मुख्यमंत्री हुए। चूंकि कर्नाटक एक अमीर राज्य है, लिहाजा कांग्रेस ने उसे अपने ‘एटीएम’ के तौर पर ग्रहण किया। कांग्रेस किसी भी तरह भाजपा सरकार बनने से रोकना चाहती थी। शायद अब वे लक्ष्य हासिल किए जा चुके हैं, लिहाजा गठबंधन भी टूट रहा है। बेशक गठबंधन को शिथिल करने में तो भाजपा की उतनी भूमिका नहीं है, लेकिन गृहमंत्री एवं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह स्पष्ट कर चुके हैं कि अब केरल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश समेत दक्षिण भारत में भाजपा का परचम लहराना अगला लक्ष्य है, लिहाजा भाजपा ऐसी राजनीति में भी टांग अड़ा सकती है, विपक्ष के फटे हुए अस्तित्व को और ज्यादा फाड़ सकती है। यदि हालात और समीकरण ऐसे ही रहे, तो कर्नाटक में मध्यावधि चुनाव भी कराए जा सकते हैं या नई सरकार भाजपा के नेतृत्व में बन सकती है, लेकिन किसी भी स्थिति में कांग्रेस-मुक्त कर्नाटक हो सकता है।