Monday, June 01, 2020 02:34 AM

कर्फ्यू ढील में मुद्दों की वापसी

बेशक राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन की विस्तारित परिभाषा में 31 मई तक हिमाचल की नसीहतें कर्फ्यू में दर्ज रहेंगी, लेकिन पाबंदियों की दूसरी तरफ हर पहलू की वापसी हो रही है। जाहिर है कर्फ्यू ढील में मुद्दों की वापसी होने के संकेत मिल रहे हैं और प्रशासनिक दीवारों से झांकते नागरिक विषय अपने प्रतिनिधित्व की जोरदार वकालत पर उतर आए हैं। प्रशासनिक प्राथमिकताओं का नागरिक सरोकारों से जबर्दस्त संघर्ष की सूचना हमें जीवन के विविध पहलुओं में उतरती दिखाई देती है, तो सवाल इस दौरान सियासी क्षमता पर भी उठने लगे हैं। किस तरह कोई विधायक कोरोना काल में अपनी आंख में रड़क रहे अधिकारी की ट्रांसफर के लिए उतावला है या इस दौर की जिरह में भी राजनीति ही परवान चढ़ेगी। इसीलिए सोशल मीडिया के युग में समीक्षा की सतह व स्तर परेशान कर सकते हैं, लेकिन सरकारी फैसलों की संवेदनहीनता की परख बढ़ जाती है। कुछ इसी तरह चिकित्सकीय तैयारियों के मंजर में कोविड सेंटरों से अस्पतालों के चयन तक पहुंची पारखी नजर का खोट इस बात से समझा जा सकता है कि नागरिक समुदाय अपनी शिकायतों का पिटारा तर्कों के साथ खोल रहा है। शिमला के रिपन अस्पताल का विकल्प तलाशने को मजबूर हुई सरकार के सामने अब धर्मशाला के जोनल अस्पताल का मामला आ गया है और जहां जनता अपने मुद्दे की बिसात में मात्र एक फैसला नहीं, सरकार की क्षमता को तोल रही है। कई बार सामान्य विषयों की तकनीकी व प्रशासनिक समझ ज्यादा स्थान लेती है या आपातकाल में असमंजस भरे निर्णयों की सरलता प्रभावी होकर कई रास्ते बंद कर देती है। यहां सामाजिक सोच की पहरेदारी में ही निर्णय ठीक होंगे, कहा नहीं जा सकता, लेकिन कुछ आधारभूत पैमाने निश्चित रूप से तय होने चाहिएं। ऐसे में केंद्र सरकार का ताजा बयान भविष्य की पैरवी में यह चुन लेता है कि जिला स्तरीय अस्पतालों में अलग से संक्रमण रोगों के लिए ब्लॉक बनाए जाएंगे। इसी से सवाल यह पैदा होता है कि कोरोना जैसे संक्रमण से लड़ने के लिए हमारी आवश्यकताएं क्या सिखा रही हैं। क्या शिमला सचिवालय को सिद्ध गुरु की भूमिका में ऐसा मंत्र मिल गया कि ताबड़तोड़ फैसलों से जनभावना को तिलांजलि दे दी जाए या हम बार-बार उस प्रश्न पर अटक जाएं कि मंडी के सांसद किस तरह हिमाचल लौटे। क्या बयानों की परिधि के बीच भाजपा सांसद और कांग्रेसी नेताओं के बीच लौटने की परिस्थितियों पर मुकाबला होता रहेगा। कोरोना काल में यह भी सही नहीं कि बाहर से लौटते हिमाचली युवाओं की मंशा को कमतर आंका जाए या सुरक्षा क्षेत्र के दायरे में एक खास समाज गठित हो जाए। बेशक कोरोना से निपटने की त्वरित छूट प्रशासन के पास है और यह भी कि रणनीतिक युद्ध में अवश्यंभावी खतरों को अनुतरित नहीं छोड़ा जा सकता, फिर भी कुछ मौलिक समझ और दस्तूर पैदा किए जा सकतें हैं। एक ओर नादौन की एसडीएम की ट्रांसफर का मामला उछलता है, तो जनता के बीच विशेषाधिकारों की परत दिखाई देती है। मामला किसी बाहर से आए व्यक्ति को संस्थागत बनाम होम क्वारंटीन बना दिया गया  और एक अधिकारी का फैसला नोचा ही नहीं गया, बल्कि उसे ट्रांसफर का जाम भी पिला दिया गया। कायदे से संस्थागत क्वारंटीन की मांग पर सारा प्रदेश एकमत है, लेकिन इस पर भी सिफारिशी रंग चढ़ा कर एक अधिकारी का मनोबल तोड़ा जाता है। इसी भावना में हर प्रशासनिक फैसले को अछूत नहीं माना जा सकता और न ही जनता के आग्रह पर संवाद की जगह रोकी जा सकती। सोमवार को धर्मशाला की जनता ने शहर के बीचोंबीच जोनल अस्पताल को कोविड के बजाय सामान्य उपचार के लिए बख्श देने का आग्रह किया, तो इसी तरह बस्तियों के बीच होटलों को क्वारंटीन केंद्र बनाने पर एतराज किया है। ऐसे फैसले के किंतु परंतु स्वास्थ्य के प्रति सरकारी प्रबंधन की शिकायत हो सकते हैं, लेकिन प्रश्नों को आधारहीन नहीं ठहराया जा सकता।