Saturday, April 20, 2019 02:10 PM

कविता

पहाड़ का आदमी जानता है

अभी-अभी बर्फ  गिर कर हटी है भागसू मैकलो और नड्डी की वादियों में दो दिन बाद लौटी है रौनक सड़क पर रेंगने लगी हैं बड़ी-बड़ी कारें काफिलों से नजारा लेने के लिए पहाड़ पर। लगता है सब के सब बिछी धवल श्वेतांबरा के सौंदर्यी स्वरूप को कैमरों में कैद कर लेने को बेचैन पागल हुए पड़े हैं बच्चों से खेलने को सब गोले के गोले मथ कर एक-दूजे पर फेंकने को आतुर ताबड़तोड़ निशाने साध रहे हैं। घरों और दयार के वृक्षों की फुनगियों से तरप-तरप पिघल रही है बर्फ ज्यों दुर्वेश्वर महादेव के सह्स्रार नेत्रों से अनवरत आंसू झर रहे हैं गरीबनवाज के घर में पकेगी रोटी और दाल जिसका बिना कंबल रजाई के दिन-रात काटना मुश्किल था। धूप खिली है तो खिल गया है टैक्सी ड्राइवर पवन का मुंह मैदानों से सैलानी आकर भर जाएंगे उसकी जेब गर्मियों का सीजन तो दे गया था तीन महीनों राशन पानी ठंडी का मौसम तो बर्फ -सा ठगता है सैलानियों, बाज़ार को भी बाबू जी नहीं तो ग्यारह सौ में मुझे कहां सूट करता है पूरा दिन टैक्सी को लगा रहा हूं यहां आप भी सैल्फी से फोटो खिंचवाओ एक से बढ़कर एक जब तक लौट नहीं आते बर्फ  के नज़ारे तमाशे देखकर मैं तब तक खड़ा हूं मौसम का पता नहीं कब बदल जाए बर्फ  कभी भी गिर सकती है मौसम के हिसाब से। यह बर्फ  का देखना और छूने का एहसास ही आनंद देता है नहीं तो उसके बाद पानी, बिजली तक गुल रहती है पहाड़ की जि़ंदगी हकीकत में पहाड़ मारने और चढ़ने सी विकट है यह पहाड़ जानता है या पहाड़ का आदमी जो बर्फ -सा जमता पिघलता रहता है दूसरों को जिंदगी बख्शने के लिए। -डा. प्रत्यूष गुलेरी