Wednesday, April 24, 2019 06:07 AM

कविता   

मुमकिन नहीं यह मुमकिन नहीं मैं थक हार जाऊं ध्वस्त, परास्त हो जाऊं तनी गर्दनों के आगे हाथ जोड़े खड़ा रहूं मौन की चादर ओढ़ लूं सांपों के बिलों में हाथ डालने की बजाय उन्हें नित दूध चढ़ाया करूं उनकी आरतियां उतारूं दुमछल्ला बनूं, पूंछ हिलाता रहूं हिंसा, नफरत, आतंक, अलगाव के विरुद्ध युद्ध नहीं सिर्फ समर्पण का समझौता करूं अपने शब्दों को तुम्हारे खेल में खिलाड़ी बनाऊं जोर जुल्म के खिलाफ बस शांत सा दिखूं, अंदर की आग को राख होने दूं नहीं, यह मुमकिन नहीं हो पाएगा क्योंकि सब से बुरा होता है वो वक्त जो इतिहास के किसी ूबही खाते में दर्ज नहीं होता सबसे गई गुजरी होती है वो कलम जिसके लिखने से न दीवारें कांपती हैं, न दिल न कहीं होती है कोई हलचल बस एक मरियल सी शांति के नाम होते हैं सारे संबोधन।

     दीप जलें

दीप जलें रोशनी दूर तलक बिखरे देर तक जिंदा रहे कि अंधेरों का साम्राज्य कहीं गहरे में दफन हो जाए बांसुरियां बजे हवाओं में मधुर राग रागनियां घुले-मिलें आंखों में सपने सजें दिलों में प्यार जागे हथियारों की भाषा ध्वस्त, परास्त हो बादल बरसें हरियाली का वनवास समाप्त हो सूखा, सूनापन कहीं शरण मांगे धरती का जिगर, ठंडा शांत हो चहुं ओर एक उजारा, नवजीवन की आस हो वसंत आए चुपचाप नहीं, ढोल बाजों के साथ जिंदगी के अर्थ लिखे रंगों और उमंगों के साथ हरियाली, नमी, खुशबू बांटें।    -हंसराज भारती, बसंतपुर, सरकाघाट