Wednesday, April 24, 2019 05:30 AM

कविता

राजनीति का रावण

अंधेरे में

रोया - सुबका

उजाले में

भागा - दौड़ा

ईमानदारी के

जूते घिसे

उसूलों का

पहना सेहरा

राजनीति का रावण

मेरी मासूमियत को

देख रहा था

छुप-छुप पीछा मेरा

ले गया मुझे वो

धोखे में

बना लिया

मोहरा मेरा

बहुत आंसू

पोंछे मैंने

तब कहीं जाकर

साफ नजर

आया मुझे सबेरा

     ढाबे वाला

ढाबे वाला हूं

व्यस्त हूं

मस्त हूं

बहुत लोग आते हैं

भोजन करके जाते हैं

मैं सबकी सेवा करता हूं

रुपया पैसा भी कमाता हूं

ताजा ताजा, और

साफ सुथरा स्वादिष्ट खाना

पाक कला से तैयार करता हूं

लोगों के स्वास्थ्य - सुपाच्य का

खूब ख्याल रखता हूं

मेरे ढाबे पर

कोई एक बार आता है

कोई कई बार आता है

जो कोई भी आता है

मेरे ढाबे के गुण गाता है।

-कश्मीर सिंह, रजेरा, चंबा