Thursday, June 20, 2019 03:28 PM

कविता

केक्टस

केक्टस का पौधा

हमेशा ठूंठ

खुरदुरा कांटों का

सरताज नहीं होता

सिर्फ़  कांटे  ही नहीं  देता

फूल-पत्तियां भी फूटती हैं उसमें

औरों को देता है नजारा

खुद तपते गलते मिटते

खुरदुरा, खूसट, गुस्सैल कोई

इन्सां  ही  क्यों न हो

बेकार रद्दी  कभी नहीं होता

रद्दी से भी  बनते हैं लिफाफे

और बहुत कुछ

कला  का हुनर तो जगाई ज़रा

मन लगा कर खो जाओ

कभी तो देते लौटाते भी

खुशियों के फूल

केक्टस  हों  या

केक्टस से आदमी

वे भी प्यार के भूखे होते हैं

उनकी भाषा पढि़ए

पुचकारिए दो मीठे बोल बोलकर

प्यार  दुख  दर्द  बांटिए

ताकि  केक्टस  हरे रहें

खिलते रहें  जीवन में।

-प्रत्यूष गुलेरी, धर्मशाला