Thursday, June 20, 2019 02:49 PM

कविता

माता-पिता तक

माता-पिता तक

घर, घर होता है

सास-श्वसुर तक

ससुराल

बहन-भाई तक

आना-जाना

इज्जत पाना

घर-बागीचे आबाद

इसके बाद किसने देखा

जिसने देखा

वाद-विवाद अथवा

ढहते मकान घर-छप्पर बरबाद

कदम कदम पर चौराहे मिलते

रहता फिल्म सरीखा याद

अंतर्मन में बजता केवल, अनहद नाद।

-डा. प्रत्यूष गुलेरी, धर्मशाला