Tuesday, August 20, 2019 11:32 AM

कश्मीर में ध्वजारोहण

देश की अखंडता को अपनी पूर्णतः में समाहित करने में जुटी भाजपा की केंद्र सरकार ने अंततः जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीयता का ध्वजारोहण कर दिया। कुछ अरसे से राज्य के घटनाक्रम में छिपे संदेहों और अफवाहों को शांत करते हुए केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के एक साथ कई ताले खोले और इस तरह अनुच्छेद 370 और 35ए की जंजीरें भी खुल गईं। अब जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख एक अलग केंद्र शासित राज्य होगा, जबकि अब तक का विशेष राज्य दर्जा खत्म हो गया। ऐसे में देश के हर भाग में एक राष्ट्र, एक विधान तथा एक निशान देखने का शपथ पत्र, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल पारित होने से मुकम्मल हो गया। पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी द्वारा राज्य के प्रति लिया गया संकल्प यानी इनसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत भी पूरा होता दिखाई देता है। कई सिंहासन टूटे, लेकिन अपने वादों के लिहाज से भाजपा की सत्ता ने वह सब कर दिया, जिसका जोखिम उठाने में आज तक कोई भी सरकार हिम्मत नहीं कर सकी। इस फैसले की पृष्ठभूमि में राजनीति इच्छाशक्ति तथा इतिहास को अपनी कलम से लिखने का सामर्थ्य दिखाई देता है। जाहिर तौर पर जम्मू-कश्मीर में वर्षों से चल रही सियासत को पस्त करते हुए यह फैसला पूरे देश की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का नया उद्घोष है। यहां राष्ट्र का विजयघोष ठीक उसी तरह सुना जा सकता है, जिस तरह तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने पोखरण धमाके के जरिए राष्ट्रीय क्षमता का उत्थान किया था। जम्मू-कश्मीर पर आए फैसले का अर्थ भी यही है कि देश की भावनाएं गौरवान्वित हों। इसकी लोकतांत्रिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय समीक्षाएं होंगी और निश्चित तौर पर फैसले की संवैधानिक चीरफाड़ अदालत तक पहुंचेगी। बेशक सरकार ने अति गोपनीय तैयारी व रणनीतिक व्यवस्था के तहत ऐतिहासिक फैसले को अमल में लाने की कोशिश की है, फिर भी जब घाटी में नया सवेरा होगा, तो कंदराओं में बंद आक्रोश बाहर आने की कोशिश करेगा। यह दीगर है कि आज की स्थिति में कश्मीर की सियासत में आबाद राजनीति की जागीरें टूटी हैं और इसलिए वहां अंदरूनी चीखोपुकार रहेगा, लेकिन दूसरी बार कोई पटेल इस देश की नीयति लिख रहा है। स्पष्ट तौर पर राष्ट्रीयता की नई व्याख्या में जम्मू-कश्मीर पुनः देश की इबारत लिख रहा है, तो पंडित जवाहर लाल नेहरू के फैसलों की समीक्षा होगी। जाहिर तौर पर जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक तथा राजनीतिक परिस्थितियां अब ऐसे मुकाम पर पहुंचेंगी, जहां राष्ट्र के संबोधन बदल चुके हैं। वास्तव में कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक का नारा बुलंद हुआ, तो इसके भीतर बिछी राजनीतिक चांदनी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी के आगे विपक्ष को चारों खाने चित होने का एक और झटका लग रहा है। विश्व समुदाय के सामने भारतीय राजनय की चुनौतियां हमेशा से कश्मीर की दुखती रग दबाती रही हैं, तो इस आधार पर यह आपरेशन की तरह किया गया फैसला है। एक निर्णायक राष्ट्र होना भारतीयता के स्वाभाविक लक्षण को इतना मजबूत तो कर ही रहा है कि हतप्रभ संसार के सामने भारत की संप्रभुता मुकम्मल दिखाई दे रही है, जबकि पाकिस्तान को केवल अपनी बगलें झांकने के सिवाय सोचने-समझने का मौका भी नहीं मिल रहा। उपमहाद्वीप की क्षेत्रीय चिंताओं के बीच भारतीय मकसद की यह एक बड़ी जीत है, क्योंकि वर्षों से कश्मीर को मुद्दा बनाकर पाकिस्तान अपने कार्ड खेलता रहा है। भारतीय आजादी का इतिहास कहीं न कहीं जम्मू-कश्मीर में अवरुद्ध रहा है, तो इस साल स्वाधीनता दिवस की पगड़ी पहनकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने फैसले का जिक्र ही नहीं, फख्र भी देश से बांटेंगे।