Thursday, July 09, 2020 04:59 AM

कसक रह गई नेता बनने की

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक

मुझे आजादी से पहले का नेता तो बनना नहीं था, कसक थी तो आजादी के बाद वाले नेता बनने की, गांधीजी जैसा नेता बनने में त्याग और बलिदान की आवश्यकता थी। फिर उनके जैसा बनना मेरे बूते के भी बाहर था। इसलिए नेता का नया रूप ही मुझे लुभा पाया था, इसमें ज्यादा मेहनत भी नहीं थी। सब कुछ दिखावे और ढोंग से होना था, जनता की आंखों में धूल झोंकनी थी, जिसमें मैं पूरी तरह माहिर था। झूठे आश्वासन देने थे, लच्छेदार भाषा में भाषण देने थे और नहा-धोकर इत्र फुलेल कर कुर्ता-पाजामा में जनसेवक का झूठा रूप धारण करना था। इस दिशा में मैं थोड़ा बहुत सक्रिय भी हो गया था, लेकिन पिताजी आड़े आ गए, एक दिन कहने लगे-‘बरखुरदार, तुम्हारे लक्षण मुझे शुभ दिखाई नहीं दे रहे, मैंने सुना है तुम नेता बनने की सोच रहे हो, वास्तविकता तो यह है बेटा नेतागिरी हमारे वश में नहीं है, इसमें जनसेवा करनी पड़ती है।’ मैं हंसकर बोला-‘आप खामखां घबरा रहे हैं। मैं जनसेवा में अपना समय जाया नहीं करूंगा। मैं इस नए जमाने का नेता बनना चाहता हूं और इसके लिए मुझे आपका मोरल सपोर्ट चाहिए, विद इन नो टाइम मैंने इस घर की तकदीर नहीं बदल दी तो मेरा नाम बदल देना। आखिर आपका बेटा जो ठहरा।’ पिताजी ने अचरज से पूछा-‘मैं तुम्हारा आशय समझा नहीं बेटा, तुम कहना क्या चाहते हो ? मेरे आदर्श तो गांधी जी हैं, वैसा जज्बा तेरे भीतर कुलबुला रहा हो तो मेरा ‘मोरल सपोर्ट’ आज से ही समझना, बाकी तेरी योजनाएं क्या हैं, मुझे विस्तार से समझा।’ मुझे पिताजी की बात पर फिर हंसी आ गई, मैं बोला-‘नहीं पिताजी, आप मेरी बात समझ नहीं पा रहे हैं। देखिए अपने घर की हालत ठीक नहीं है, हम लोग गरीब हैं, घर की प्राथमिक आवश्यकताएं ही बड़ी कठिनाई से हम लोग जुटा पाते हैं। मैं इस नए जमाने का नेता बनना चाहता हूं।’ पिताजी फिर असमंजस में पड़ गए और बोले-‘नए जमाने का नेता कैसा होता है बेटा? तुम कहीं जीवन मूल्यों से हटकर घोटालेबाज बनने की बात तो नहीं कह रहे हो?’ मैं बोला-‘अब आपने ठीक जाना और सही रूप में मुझे पहचाना। बिना घोटाला किए आज के जमाने का नेता नहीं बना जा सकता। आप शायद नहीं जानते कि मैं मुफ्त का पैसा कमाने के लिए किस हद तक जाकर गिर सकता हूं?’ पिताजी का मुंह खुला का खुला रह गया। उन्हें मुझसे शायद ऐसी आशा नहीं थी, मैं ही बोला-‘आप इससे तनिक भी मत घबराइए।’

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