Wednesday, August 21, 2019 04:14 AM

कहां गई हैं सुषमा दी

1988 की एक दोपहर याद आ रही है। चंडीगढ़ में हरियाणा सचिवालय की चौथी मंजिल के एक कक्ष में प्रवेश किया, तो सामने बड़ी ऊंची कुर्सी पर छोटी-सी मंत्री महोदया विराजमान थीं। परिचय के बाद हमने अपनी जिज्ञासा साझा की कि उन्हें मंत्री के रूप में देखना चाहता था। तपाक से बोलीं-‘लो, आपके सामने बैठी हूं। पूछो, जो भी आप जानना चाहते हैं।’ लेकिन आज उस शख्सियत का पार्थिव अस्तित्व हमारे सामने नहीं है। सुषमा स्वराज दुनियावी और कुदरती मायनों में दिवंगत हो चुकी हैं, पंचतत्त्व में विलीन हो चुकी हैं, सहेली ‘मौत’ के साथ अनंत यात्रा पर निकल गई हैं। सज-संवर कर सुहाग के लाल जोड़े में थीं सुषमा दीदी। शायद कहीं जरूरी काम से गई हैं। यह हमारी तसल्ली भी है, लेकिन उनकी चिरंतन प्रासंगिकता भी है, लिहाजा हमेशा के लिए अलविदा कैसे बोल दें? सुषमा स्वराज भारत ही नहीं, विश्व इतिहास के संदर्भों में हमेशा जिंदा रहेंगी। हरियाणा सचिवालय की मुलाकात के दौर में वह देवीलाल सरकार में शिक्षा मंत्री थीं। उससे पहले 1977 के जनता पार्टी के दौर में भी देवीलाल मुख्यमंत्री बने थे और 25 वर्षीय सुषमा स्वराज को श्रम मंत्री के तौर पर कैबिनेट में पहली बार स्थान मिला था। सबसे कम उम्र में इस उपलब्धि का कीर्तिमान सुषमा के नाम ही है। उस दौर में उन्होंने हजारों सरकारी शिक्षकों के तबादले किए थे। खलबली मच गई थी, कई असंतुष्ट भी थे, लेकिन शिक्षा मंत्री सुषमा स्वराज के खिलाफ जन-आंदोलन की चिंगारी तक भी नहीं सुलगी थी, लिहाजा अंतकाल तक उन्हें जन-पक्षधरता और जन-सरोकारों की नेता करार दिया जाता रहा। 1990 के दौर में उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में आगाज दिया गया। वहां से लेकर पार्थिव देहांत तक सुषमा की छवि जनप्रिय, सहयोगी, संवेदनशील, मानवीय और कारुणिक, राष्ट्रवादी नेता की बनी रही। उन्हें केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की तीनों आधी-अधूरी और पूरी सरकारों में कैबिनेट मंत्री के दायित्व सौंपे जाते रहे। वह सूचना एवं प्रसारण और स्वास्थ्य मंत्री रहीं। उन्होंने संसद की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की शुरुआत की, तो देशभर में छह एम्स अस्पताल स्थापित कराए। ये प्रयास और निर्णय ‘लोकतांत्रिक’ करार दिए जा सकते हैं। सुषमा स्वराज ने चार दशक से ज्यादा के राजनीतिक करियर में कई भूमिकाएं अदा कीं और अनेक दायित्व निभाए। भाजपा के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी के बावजूद लोकसभा में उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दायित्व दिया गया। महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि सुषमा स्वराज को मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रतिपक्ष का चेहरा बनाया जाता रहा। ऐसे ओहदे लोकतंत्र में सभी को मिलते रहे हैं, लेकिन गरिमामय यह है कि प्रत्येक भूमिका और किरदार में सुषमा दी’ ओजस्वी, शालीन, सभ्य, विनम्र, संयमी भी बनी रहीं, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक तर्कों और शब्दों की प्रखरता और सटीकता को बरकरार भी रखा। वह भारतीय राजनीति में आदर्श और परंपरागत महिला की प्रतीक बनीं। अब वह पार्थिव तौर पर हमारे साथ नहीं हैं, तो त्योहार भी रोएंगे, मौसम भी उदास होंगे, झूले भी मस्त नहीं होंगे और करवा चौथ आएगा, तो कौन राष्ट्रीय दुल्हनिया बनेगा और छलनी के उस पार कौन खड़ा दिखाई देगा। नियति ने सभी सवालों के जवाब तय कर दिए हैं। सुषमा स्वराज का आखिरी राजनीतिक किरदार विदेश मंत्री का था। वह भारत राष्ट्र की प्रथम और एकमात्र पूर्णकालिक विदेश मंत्री रहीं, जिन्होंने पांच साल का अपना कार्यकाल भी संपन्न किया। हालांकि उनसे पहले इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के साथ-साथ कार्यवाहक विदेश मंत्री का दायित्व भी निभाया था, लेकिन चर्चा संपूर्णता की हो रही है। विदेश मंत्री के तौर पर सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र के 191 देशों में से 186 देशों तक भारत की पहुंच बनाई। उन्होंने सूडान, लीबिया और यूएन में ही फंसे भारतीयों के अलावा विदेशियों को भी बचाया, घर-वापसी संभव कराई, लिहाजा सुषमा दी’ किसी के लिए मां, किसी की बहन, किसी के लिए देवदूत बनकर प्रकट होती रहीं। पाकिस्तान से 15 साला मूक, बधिर गीता को हिंदुस्तान लाने में उनका महान योगदान था, यह दुर्भाग्य है या नियति का खेल है कि उस लड़की को उसके माता-पिता आज तक नहीं मिल पाए हैं। एक राजनेता के तौर पर सुषमा की शख्सियत का व्याख्यान एक संपादकीय में असंभव है, लेकिन सुषमा स्वराज अपने अंदाज-ए-बयां, भाषायी ज्ञान, कमाल के उच्चारण, तार्किकता, स्मरण-शक्ति के साथ-साथ मानवीय व्यवहार के लिए कभी नहीं भूली जा सकतीं। ऐसा शख्स दिवंगत कैसे हो सकता है? हम फिर दोहरा रहे हैं कि वह किसी जरूरी काम से कहीं गई होंगी, प्रतीक्षा करें, आती ही होंगी।