Monday, November 18, 2019 04:05 AM

कांग्रेस की असमंजस

आज कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इस्तीफे से उपजे असमंजस की बात करेंगे। राहुल ने इस्तीफा दिया, लेकिन पार्टी के बार-बार आग्रहों के बावजूद उसे वापस नहीं लिया। अपने इरादे पर अडिग रहे, लिहाजा सतही तौर पर उसे ‘नाटक’ करार नहीं दिया जा सकता। राहुल गांधी व्यथित हैं। उनकी पीड़ा बयां भी हुई है कि लोकसभा चुनाव में करारी पराजय के बावजूद किसी भी मुख्यमंत्री, पार्टी महासचिव और सचिव, पार्टी प्रदेश अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी ने इस्तीफे की पेशकश तक नहीं की। चुनाव लड़ना और उम्मीदवार तय करना एक सामूहिक, साझा प्रक्रिया है। राहुल गांधी खुद को जिम्मेदार आंक रहे हैं, क्योंकि पूरा चुनाव अभियान उन्होंने ही ढोया। किसी ने ‘चौकीदार चोर है...’ नारे का समर्थन तक नहीं किया। चापलूसों ने उन्हें आकलन दिए थे कि अकेली कांग्रेस 184 सीटें जीत रही है। 150-160 सीटें तो निश्चित हैं। अब सबसे पहले राहुल गांधी को बतौर कांग्रेस अध्यक्ष उन चापलूसों की जमात को बर्खास्त करना चाहिए। अपने इर्द-गिर्द खोखले सलाहकारों को तुरंत प्रभाव से निकाल देना चाहिए। बेशक वह कांग्रेस अध्यक्ष रहें या न रहें, लेकिन पार्टी की भावी बेहतरी के लिए ‘जंगली घास’ को खत्म करना बेहद जरूरी है। चूंकि राहुल गांधी आज भी कांग्रेस अध्यक्ष हैं, लिहाजा राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों की तुरंत ‘छुट्टी’ की जानी चाहिए। सरकारें कांग्रेस की और लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ...! यह गंभीर राजनीतिक दोष है। कांग्रेस की करारी हार पर राहुल गांधी आत्ममंथन कर सकते हैं, पीडि़त होने से हासिल क्या होगा? इस चुनावी पराजय ने उन्हें आईना दिखा दिया है कि कौन वाकई ‘कांग्रेसी’ है। यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष केशव नाथ ने इस्तीफे की पेशकश नहीं की है। पार्टी संगठन में किसी भी महासचिव और प्रदेश अध्यक्ष ने इस्तीफा नहीं भेजा है, लेकिन कांग्रेस मुख्यालय का भीतरी यथार्थ यह है कि वहां मोतीलाल वोरा सरीखे अति बुजुर्ग और पंजाब की प्रभारी महासचिव आशा कुमारी सरीखे नेता तो नियमित बैठे देखे जा सकते हैं। अन्य पदाधिकारी इस असमंजस में हो सकते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष कौन बनेगा और समीकरण कैसे तय होंगे? स्पष्ट है कि राहुल गांधी के इस्तीफे और कांग्रेस छोड़ कर जाने की संभावित स्थितियों से कोई भी नेता चिंतित नहीं है। बेशक अभी तक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के समर्थन में करीब 150 इस्तीफों की पेशकश की जा चुकी है, लेकिन वे सभी बेमानी हैं, क्योंकि पार्टी की सर्वोच्च इकाई कांग्रेस कार्यसमिति के बार-बार निर्णय के बावजूद राहुल गांधी अपना इस्तीफा वापस लेने को तैयार नहीं हुए हैं। कांग्रेस कार्यसमिति ने शनिवार को भी राहुल का इस्तीफा अस्वीकार कर दिया है। तो फिर इतनी बड़ी पार्टी कैसे चलेगी? कमोबेश हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, दिल्ली, बिहार, हिमाचल और उत्तराखंड आदि राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष और वहां की सभी कमेटियां तो बदली ही जानी चाहिए। इन राज्यों में या तो कांग्रेस ‘शून्य’ हुई है अथवा 1-2 सांसद ही चुने गए हैं। बहरहाल राहुल गांधी अध्यक्ष रहें या अब कांग्रेस को गांधी परिवार के बाहर भी सोचने की आदत डालनी पड़ेगी, लेकिन यथाशीघ्र कांग्रेस की तमाम असमंजस दूर होनी चाहिए। पार्टी एक कार्यकारी अध्यक्ष तय कर सकती है या किसी को वैकल्पिक अध्यक्ष चुन सकती है। जब पार्टी का संकट शांत होने लगे, तो राहुल गांधी को वापस लाया जा सकता है। सोनिया गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के साथ कितना दुर्व्यवहार किया गया था, वह सब कुछ इतिहास में दर्ज है। नया अध्यक्ष लाने से राहुल गांधी का मौजूदा संकल्प भी पूरा हो जाएगा। गौरतलब तो यह है कि हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र सरीखे राज्यों में अक्तूबर तक विधानसभा चुनाव होने हैं, उत्तर प्रदेश में भी कई उपचुनाव होने हैं और सभी जगह भाजपा सत्ता में है। चुनाव सिर पर हैं और कांग्रेस में अध्यक्ष को लेकर असमंजस है, तो फिर चुनाव जनादेश की कल्पना की जा सकती है। कांग्रेस को घबरा कर मैदान नहीं छोड़ना चाहिए। उसे लोकसभा चुनाव में 12 करोड़ से ज्यादा वोट मिले हैं। इस समर्थन के मद्देनजर ही नया संगठन खड़ा किया जाए, नई गोलबंदी बने, पार्टी का ढांचा निश्चित हो, संपूर्ण देश में संगठन और काडर सक्रिय हो, नए बनाम पुराने की बहस नहीं छिड़नी चाहिए, बल्कि उसे अंजाम दिया जाए। कई पुराने नेता पार्टी पर बोझ बने हैं, लेकिन ‘गांधी परिक्रमा’ कर अपने राजनीतिक अस्तित्व बरकरार रखे हैं। उनकी छंटनी होनी चाहिए और उन्हें आराम दिया जाए। यह तमाम कार्रवाइयां तभी संभव हैं, जब एक नियमित और स्थायी कांग्रेस अध्यक्ष होगा।