Sunday, November 17, 2019 04:38 PM

कांग्रेस में ‘राक्षस’ कौन?

हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर ने पार्टी ही छोड़ दी और प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस में उनका शोषण किया गया अथवा पार्टी ‘हुड्डा कांग्रेस’ बन गई या राहुल गांधी के करीबी नेताओं की ‘राजनीतिक हत्या’ की साजिश रची जा रही है! ये तमाम आरोप राजनीतिक बयान हैं और ऐसे मौकों पर नेताओं द्वारा भड़ास निकालने के लिए ऐसा बोला जाता रहा है, लेकिन तंवर ने एक गंभीर आरोप लगाया है कि सोनिया कैंप में ‘राक्षसी प्रवृत्ति’ के लोग हैं! आखिर कांग्रेस में ऐसे लोग कौन हैं? अशोक तंवर अब उनके नाम क्यों छिपा रहे हैं? क्या ऐसा आरोप चस्पां करने से हरियाणा में कांग्रेस की चुनावी स्थिति बेहतर हो जाएगी? बेशक कांग्रेस में इस समय घमासान और कोहराम मचा है। पार्टी लगातार बिखराव और टूटन झेल रही है। ऐसा शायद ही कोई दिन होता है, जब पार्टी नेता कांग्रेस छोड़ कर भाजपा या अन्य पार्टी में शामिल नहीं होते! झारखंड में भी हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद चुनाव होने हैं। कांग्रेस के भीतरी सिर-फुटव्वल के कारण प्रदेश अध्यक्ष अजॉय कुमार पूर्व आईपीएस को पार्टी छोड़ कर आम आदमी पार्टी (आप) में जाना पड़ा। महाराष्ट्र में ही कई बड़े नेताओं समेत सांसद-विधायक रहे नेता भाजपा या शिवसेना में शामिल हो चुके हैं। मुंबई के अध्यक्ष रहे संजय निरूपम कभी भी कांग्रेस को अलविदा कह सकते हैं। उन्होंने नाराज और निराश होकर कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ  जो बयान दिए हैं, उनके मद्देनजर वैसे ही उन्हें पार्टी से निकाल देना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस में फिलहाल चौतरफा असंतोष है। किस-किस को पार्टी से निकालेंगे? रायबरेली तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का चुनाव क्षेत्र है। वहां पूर्व विधायक अखिलेश सिंह गांधी परिवार के पुराने वफादार रहे हैं, लेकिन वह दिवंगत हो चुके हैं। अब उनकी बेटी अदिति सिंह रायबरेली सदर से ही विधायक हैं। वह पार्टी निर्देशों के उलट जाकर विधानसभा के विशेष सत्र में शामिल हुईं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 36 घंटे का विशेष सत्र बुलाया था। अदिति ने कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने का भी समर्थन किया है। यह भी पार्टी लाइन के उलट है। अदिति का कहना है कि वह जनता के पक्ष और हित का ही काम करेंगी, बेशक पार्टी लाइन हो या न हो। कांग्रेस ने उन्हें नोटिस दिया था। कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हरियाणा में तंवर बेशक पांच साल तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे, सिरसा से लोकसभा सांसद भी रहे, लेकिन वह ऐसे कद्दावर नेता नहीं हैं कि चुनावी दिशा और दशा तय कर सकें, लेकिन सिरसा समेत भिवानी, हिसार, फतेहाबाद आदि इलाकों की दर्जन भर सीटों पर कमोबेश कांग्रेस उम्मीदवारों को हरवा जरूर सकते हैं। बुनियादी सवाल यह है कि कांग्रेस में इतना घमासान क्यों मचा है? चुनावी पराजय तो अपरिहार्य है। भाजपा के भी 1984 में लोकसभा में मात्र दो सांसद थे, लेकिन उसने संगठन की सामूहिक ताकत के आधार पर अपना विस्तार किया और आज वह कांग्रेस के पुराने जनाधार को अपने में समेट चुकी है। असंतोष और टिकट न मिलने का बागीपन भाजपा में भी है, लेकिन खुलेआम नहीं है और शीर्ष नेतृत्व बागियों को मनाने की सम्यक कोशिश करता है। कांग्रेस की मौजूदा विडंबना यह है कि सोनिया बनाम राहुल टकराव के आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि मां-बेटे के बीच ऐसा कोई टकराव संभव ही नहीं है। सोनिया गांधी फिलहाल पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष भी हैं। तंवर ने यह आरोप भी लगाया है कि टिकट पांच करोड़ रुपए में बेचे गए हैं। उन्होंने हुड्डा के साथ-साथ प्रभारी गुलाम नबी आजाद को भी गरियाया, जिन्हें हरियाणा की जमीनी हकीकत की जानकारी तक नहीं है। बहरहाल 21 अक्तूबर को हरियाणा और महाराष्ट्र में मतदान है और 24 अक्तूबर को जनादेश भी सार्वजनिक हो जाएंगे। उसके बाद झारखंड और दिल्ली में विधानसभा चुनाव हैं। अगले साल की शुरुआत में ही बिहार में भी चुनाव होने हैं। कांग्रेस हरेक राज्य में पराजित मनः स्थिति और बिखरे संगठन का यथार्थ झेल रही है। तंवर, निरूपम, अजॉय, अदिति हर प्रदेश में हैं। मुद्दे गायब हैं। पार्टी के फिलहाल नेतृत्व को लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी को गालियां देकर जनादेश हासिल किए जा सकते हैं, तो यह उसका गंभीर मुगालता है। सवाल यह भी है कि मौजूदा हालात को देखते कांग्रेस का पुनरोत्थान होगा या नहीं...?