Tuesday, March 31, 2020 08:12 PM

कानून की गलत व्याख्या का आंदोलन

सर्वोच्च न्यायालय के भेजे वार्ताकार शाहीन बाग गए, लोगों की बात सुनी, दलीलें भी सुनी गईं, लेकिन गतिरोध यथावत है। हालांकि संवाद का पहला ही दिन था और अभी रविवार तक का समय शेष है, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने साफ  कह दिया है कि यदि नागरिक संशोधन कानून (सीएए) वापस नहीं लिया गया, तो वे सड़क से नहीं हटेंगे। धरना-प्रदर्शन जारी रहेगा। प्रदर्शनकारी अपनी जिद पर अड़े हैं। बेशक संवाद की शुरुआत हुई है, लेकिन मानस में पूर्वाग्रह मौजूद हैं। इस कानून को वे अपने वजूद से जोड़ कर उसकी व्याख्या कर रहे हैं। उन्होंने यह भी ऐलान किया है कि अप्रैल से शुरू होने वाले एनपीआर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) को भी नहीं मानेंगे। बहरहाल इतना संतोष किया जा सकता है कि एक सिलसिला तो शुरू हुआ है, लेकिन कोई भी नागरिक या संगठन एक सार्वजनिक रास्ते या सड़क को बंधक नहीं बना सकता। शाहीन बाग का अपहरण किया गया है, बेशक धरनेबाज औरतें कुछ भी दलील दें। यह विरोध अनर्गल और अविवेकी लगता है। बेशक यह लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन असंवैधानिक भी है। दूसरे नागरिकों के अधिकार पर डाका डालना भी है। प्रदर्शनकारी देश की संसद पर ही सवाल कर रहे हैं और 543 चुने हुए सांसदों को ही बेमानी मान रहे हैं कि आखिर वे देश की 137 करोड़ से ज्यादा की आबादी की नियति कैसे तय कर सकते हैं? आश्चर्य है कि एक भी प्रदर्शनकारी और उनके नेता न तो सीएए की सही व्याख्या कर रहे हैं और न ही मुस्लिम समुदाय को गुमराह करने से बाज आ रहे हैं। वार्ताकार संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन बेहद विनम्र नजर आए, वे हाथ जोड़ कर आंदोलनकारी भीड़ को पुचकारते रहे, समझाते रहे, लेकिन कई औरतों ने कहा कि यह भीड़ और जमात ‘मिनी पाकिस्तान’ नहीं, बल्कि ‘हिंदोस्तान’ है। सभी प्रदर्शनकारी एक ही स्वर में दावा कर रहे हैं कि यह काला कानून है। संविधान की भावना के खिलाफ  है। हम संविधान की रक्षा करेंगे। कौन-सा खतरा है संविधान को...? यह भी अफवाह फैलाई गई है कि जब तक सवालिया मुस्लिम आबादी अंततः सर्वोच्च अदालत तक से जीत कर अपनी नागरिकता को साबित नहीं करती, तब तक उन्हें हिरासत केंद्रों में रखा जाएगा। यह दावा मुस्लिम नेता ओवैसी ने भी किया है। उनसे सवाल किया जाना चाहिए कि सरकार ने ऐसा फैसला कब किया है? कैबिनेट ने इस फैसले पर कब मुहर लगाई है? किस मीडिया में यह फैसला प्रकाशित किया गया? क्या ऐसे फैसले को किसी भी नागरिक या संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है? गलत व्याख्या और गुमराह करने वाली सियासत ने देश में बेहद नाजुक हालात पैदा कर दिए हैं। बात 85 फीसदी बनाम 15 फीसदी की हो रही है। मनु स्मृति को लागू करने से रोकने की दलीलें दी जा रही हैं। हकीकत है कि देश की संवैधानिक व्यवस्था में मनु स्मृति का कोई स्थान नहीं है। बहरहाल इन हालात ने विभाजक समीकरण बना दिए हैं। देश का भाईचारा भी प्रभावित हो सकता है। इससे किसी भी राजनेता या सियासी दल को क्या हासिल होगा? शाहीन बाग सिर्फ  दिल्ली में ही नहीं है, कई राज्यों में कई जगह ऐसे विरोध-प्रदर्शन जारी हैं। सिर्फ  भ्रामक प्रचार के आधार पर...! इन्हीं स्थितियों के मद्देनजर असम में जाबैदा बेगम और उसके परिवार को ‘संदिग्ध मतदाता’ की सूची में डाल दिया गया है। हैदराबाद में आधार कार्ड के विभाग ने 127 लोगों को अवैध अप्रवासी मानते हुए तलब किया है। बेशक ऐसे में नागरिकता पर शंकाएं और सवाल बढ़ने लगते हैं। हालांकि कानून में ऐसी व्याख्या करने वाले प्रावधान ही नहीं हैं। असम का उदाहरण देना भी फिजूल है, क्योंकि वहां एनआरसी को लेकर जो कवायद की गई थी, उसे औपचारिक मान्यता अभी नहीं दी गई है।  तो फिर किसी की भी नागरिकता का मानदंड उसे क्यों बनाया जा रहा है? संभवतः दोनों या तीनों वार्ताकार इन भ्रांतियों को नहीं सुलझा पाएंगे! बहरहाल यह भी कोशिश कर लीजिए, लेकिन गुत्थियां तभी खुलेंगी, जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों से रू-ब-रू बातचीत करेंगे। यह वोट बैंक से ज्यादा संवेदनशील मामला है।