Monday, July 22, 2019 02:23 PM

कामचोर बाबुओं की खैर नहीं

धारा 56 के मुताबिक, यदि किसी सरकारी कर्मचारी की उम्र 50 साल या ज्यादा है और वह 20 साल तक नौकरी कर चुका है, तो उसे जबरन रिटायर किया जा सकता है। मोदी सरकार आयकर विभाग और सीमा एवं उत्पाद शुल्क के 27 अधिकारियों और कर्मचारियों को ऐसी सेवानिवृत्ति दे चुकी है। उनमें चीफ आयकर कमिश्नर स्तर के अधिकारी भी थे। आईपीएस के नौ अफसर भी रिटायर किए गए। वे अदालत का दरवाजा भी खटखटा नहीं सकते। अलबत्ता उन्हें पेंशन जरूर मिलती रहेगी। यह दीगर है कि उन अधिकारियों पर कामचोरी के आरोप तो थे ही, लेकिन भ्रष्टाचार के दाग भी थे। देश के 19 राज्यों में 110 जगहों पर सीबीआई के करीब 500 अफसरों की टीम ने छापे मारे हैं और 30 केस दर्ज भी किए हैं। अफसरों के घरों और दफ्तरों में छापे मारे गए हैं। इस दौरान सीबीआई ने 455 ग्राम सोना,11 लाख रुपए और बड़ी संख्या में आपत्तिजनक दस्तावेज भी बरामद किए हैं। सीबीआई टीम ने हिमाचल प्रदेश में अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति में 250 करोड़ रुपए की हेराफेरी के सिलसिले में तलाशी भी ली है। पूरी कार्रवाई की निगरानी खुद सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला कर रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी सरकारी व्यवस्था को साफ करना चाहते हैं। उन्होंने दूसरी पारी का कार्यभार संभालते ही नौकरशाहों को आगाह कर दिया था। ऐसे मामले भी सामने आए थे कि 40-50 साल पुरानी योजनाओं की फाइलें अब भी लटकी हैं। जब अरुण शौरी केंद्र की वाजपेयी सरकार में मंत्री थे, तो कर्मचारियों की कामचोरी के कुछ उदाहरण उनके सामने आए। अरुण शौरी के कार्यालय से एक फाइल भेजी गई, जो 97 दिनों के बाद लौट आई। उसी फाइल को दोबारा चलाया गया, तो छह महीने बाद वह भी लौट आई। दोनों ही बार फाइल पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी। इससे ज्यादा नकारापन और क्या हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी इस संस्कृति को समाप्त करना चाहते हैं और फाइल की आड़ में जो भ्रष्टाचार खेला जाता है, उसकी जड़ भी काट देना चाहते हैं। प्रधानमंत्री का मिशन है कि योजनाएं नकारा कर्मचारियों और भ्रष्ट अफसरों के कारण नहीं लटकेंगी। प्रधानमंत्री का मानना है कि ऐसी छंटनी से सरकारी महकमे साफ तो होंगे, लेकिन उनकी विश्वसनीयता भी स्थापित होगी। प्रधानमंत्री के ‘मिशन क्लीन’ को राष्ट्रीय आयाम भी दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में इस मिशन के तहत योगी आदित्यनाथ सरकार ने 600 अफसरों और कर्मचारियों को जबरन रिटायर करने की सिफारिश मोदी सरकार से की है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी मुख्य सचिव से कामचोर और भ्रष्ट कर्मचारियों की सूची मांगी है। बेशक राज्य सरकारें जबरन सेवानिवृत्ति की सूची तैयार करेंगी, लेकिन अंतिम निर्णय मोदी सरकार के स्तर पर ही लिया जाएगा। यह व्यवस्था सवालिया हो सकती है। हर महीने बाबुओं के काम की समीक्षा की जाएगी। मूल्यांकन का आधार क्या होगा और कौन समीक्षक होंगे? वे पूर्वाग्रही भी हो सकते हैं। हर माह की 15 तारीख तक कामचोर और भ्रष्ट कर्मचारियों की सूची सरकार को देनी होगी। बेशक आगाह किया गया है कि कोई पूर्वाग्रह से निर्णय नहीं करेगा, लेकिन यह तो मानवीय प्रवृत्ति है। प्रधानमंत्री का यह मिशन प्रशंसनीय है, क्योंकि अफसरशाही और दफ्तर के औसत व्यवहार से हम बेहद दुखी और तनावग्रस्त हैं। डीडीए का ही उदाहरण लें और प्रधानमंत्री एक खुफिया छापा उस दफ्तर पर मरवाएं। डीडीए कर्मचारी औसतन बदतमीज हैं। जो काम 60 या 90 दिन में होने हैं, वे दो-तीन साल तक लटके रहते हैं। यदि उनकी जेब गरम कर दी जाए, तो काम तुरंत भी हो जाता है। हमारा यह मानना है कि बेशक यह मिशन व्यवस्था की सफाई के संदर्भ में बेहद ईमानदार है, लेकिन हमारी व्यवस्था, कर्मचारी, अधिकारी मानसिक तौर पर बेईमान और भ्रष्ट हैं। इतनी व्यापक सफाई संभव नहीं है। तथ्य यह भी है कि पेंशन का बजट तनख्वाह के बजट से ज्यादा है, लिहाजा सफाई तो जरूरी है, लेकिन यह किसी आंदोलन से कम नहीं है। देश के आम आदमी की भूमिका भी बेहद महत्त्वपूर्ण है।