Monday, September 23, 2019 02:24 AM

कारपोरेट उत्तरदायित्व का परिदृश्य

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

कंपनी अधिनियम की धारा 135 के नए सीएसआर मानकों के मुताबिक यदि कोई कंपनी अपने मुनाफे का निर्धारित हिस्सा निर्धारित सामाजिक गतिविधियों पर खर्च नहीं कर पाए तो जो धनराशि खर्च नहीं हो सकी उसे कंपनी से संबद्ध बैंक में सोशल रिस्पांसिबिलिटी अकाउंट में जमा किया जाना होगा। कंपनियों की सीएसआर का बगैर खर्च किया हुआ धन स्वच्छ भारत कोष क्लीन गंगा फंड और प्रधानमंत्री राहत कोष जैसी मदों में डालना होगा...

हाल ही में सरकार ने जिस कंपनी संशोधन विधेयक-2019 को पारित किया है उसके तहत उन कंपनियों पर जुर्माना लगाने के प्रावधान भी शामिल हैं जो कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व यानी कारपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के लिए अनिवार्य दो फीसदी का खर्च नहीं करती हैं। नए संशोधनों से कंपनियों की सीएसआर गतिविधियों में जवाबदेही तय करने में आसानी होगी। कंपनी अधिनियम की धारा 135 के नए सीएसआर मानकों के मुताबिक यदि कोई कंपनी अपने मुनाफे का निर्धारित हिस्सा निर्धारित सामाजिक गतिविधियों पर खर्च नहीं कर पाए तो जो धनराशि खर्च नहीं हो सकी उसे कंपनी से संबद्ध बैंक में सोशल रिस्पांसिबिलिटी अकाउंट में जमा किया जाना होगा।

कंपनियों की (सीएसआर) का बगैर खर्च किया हुआ धन स्वच्छ भारत कोष, क्लीन गंगा फंड और प्रधानमंत्री राहत कोष जैसी मदों में डालना होगा। गौरतलब है कि 500 करोड़ रुपए या इससे ज्यादा नेटवर्थ या पांच करोड़ रुपए या इससे ज्यादा मुनाफे वाली कंपनियों को पिछले तीन साल के अपने औसत मुनाफे का दो प्रतिशत हिस्सा हर साल सीएसआर के तहत उन निर्धारित गतिविधियों में खर्च करना होता है, जो समाज के पिछड़े या वंचित लोगों के कल्याण के लिए जरूरी हों। इनमें भूख, गरीबी और कुपोषण पर नियंत्रण, शिक्षा को बढ़ावा , पर्यावरण, संरक्षण, खेलकूद प्रोत्साहन, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, तंग बस्तियों के विकास आदि पर खर्च करना होता है। लेकिन विभिन्न अध्ययन रिपोर्टों में पाया गया कि बड़ी संख्या में कंपनियां सीएसआर के उद्देश्य के अनुरूप खर्च नहीं करती हैं। वे सीएसआर के नाम पर मनमाने तरीके से खर्चे कर रही हैं। कई कंपनियां अपने सीएसआर फंड्स का इस्तेमाल गु्रप से जुड़े ट्रस्ट पर कर रही हैं। स्थिति यह है कि एसएंडपी बीएसई 100 सूची में शामिल कंपनियों में से कोई एक तिहाई कंपनियों ने सीएसआर गतिविधियों पर तय सीमा से कम खर्च किया है। जहां भारतीय कंपनियों ने 2017-18 में सीएसआर गतिविधियों पर 75363 करोड़ रुपए खर्च किए वहीं इसी वर्ष कुछ कंपनियों द्वारा सीएसआर के लिए निर्धारित 989 करोड़ रुपए की राशि खर्च नहीं की गई। ऐसे में अभी तक जो कंपनियां सीएसआर को रस्मअदायगी मानकर उसके नाम पर कुछ भी कर देती थीं उनके लिए अब मुश्किल हो सकती है। सीएसआर के मोर्चे पर सरकार सख्ती करने जा रही है।

अब कंपनियां केवल यह कहकर नहीं बच पाएंगी कि उन्होंने सीएसआर पर पर्याप्त रकम खर्च की है। अब उन्हें बताना पड़ेगा कि खर्च किस काम में किया गया। उसका नतीजा क्या निकला और समाज पर उसका कोई सकारात्मक असर पड़ा या नहीं। यह बताना होगा कि क्या यह खर्च कंपनी से जुड़े किसी संगठन पर हो रहा है। अब सरकार के द्वारा कंपनियों के सीएसआर के बारे में नए नियमों को ध्यान में रखना होगा। इन नियमों के तहत सीएसआर खर्च के तहत निचले स्तर पर शामिल कंपनियों के लिए खुलासे की न्यूनतम बाध्यता होगी। खर्च की रकम बढ़ने के साथ-साथ अधिक से अधिक जानकारी देनी होगी । लेकिन सबसे ऊपर की सीमा में शामिल कंपनियों से ज्यादा जानकारी मांगी जाएगी। सरकार सीएसआर गतिविधियों के खुलासे के लिए कंपनी के निदेशकों की जवाबदेही बढ़ाने के वास्ते भी नियमों का सख्ती के साथ पालन करना होगा। अगर कंपनियां तीन साल तक निर्धारित सीएसआर फंड का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं तो उस राशि को नेशनल सीएसआर फंड में जमा करना होगा।

अब सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत सीएसआर की विभिन्न मान्य गतिविधियों पर ही खर्च सुनिश्चित करना होगा। इनमें अनाथालय और छात्रावास की स्थापना, वृद्धाश्रम की स्थापना, डे केयर केंद्रों की स्थापना महिलाओं के लिए घर और छात्रावासों की स्थापना तथा इनके लिए भवन का निर्माण, रख-रखाव व संचालन करना शामिल है। राष्ट्रीय धरोहर, कला और संस्कृति की सुरक्षाए पारंपरिक कला एवं हस्तशिल्प को बढ़ावा देना और उनका विकास करना, ग्रामीण खेलों, राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त खेलों ओलंपिक खेलों और पैरालंपिक खेलों को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण मुहैया कराना आदि भी सीएसआर खर्च के तहत सम्मिलित है। इसी तरह सीएसआर खर्च के तहत कुछ और प्रमुख मदें भी सुनिश्चित की गई हैं। केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में स्थित प्रौद्योगिकी इनक्यूबेटरों के लिए फंड मुहैया कराना, शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए काम करना, मिट्टी, हवा और जल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए काम करना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण पारिस्थितिक संतुलन को सुनिश्चित करना, वनस्पतियों- जीव संरक्षण, पशु कल्याण, कृषि वानिकी का संरक्षण आदि सीएसआर खर्च गतिविधियों में शामिल है।

ग्रामीण विकास परियोजनाएं, जीविका वृद्धि संबंधी परियोजनाएं, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को बढ़ावा देना, असमानता का दंश झेल रहे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछडे़ समूहों के लिए काम करना सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना आदि को भी सीएसआर खर्च गतिविधियों में शामिल किया गया है। निश्चित रूप से जैसे-जैसे देश में कारपोरेट जगत छलांगे लगाकर आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे उसका सामाजिक उत्तरदायित्व भी बढ़ रहा है। देश में कारपोरेट जगत के सामाजिक उत्तरदायित्व की नई जरूरतें उभरकर सामने आई हैं। ज्ञातव्य है कि सीएसआर किसी तरह का दान नहीं है। दरअसल यह सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ कारोबार करने की व्यवस्था है। कारपोरेट जगत की जिम्मेदारी है कि वह स्थानीय समुदाय और समाज के विभिन्न वर्गों के बेहतर जीवन के लिए सकारात्मक भूमिका निभाए। खासतौर से देश के आम आदमी के बेहतर जीवन स्तर, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और नई पीढ़ी को मानव संसाधन ह्यूमन रिसोर्स बनाने से संबंधित कदम सबसे ज्यादा जरूरी दिखाई दे रहे हैं। वस्तुतः देश की नई पीढ़ी को प्रतिभा सम्पन्न बनाकर पेशेवर प्रोफेशनल के रूप में तैयार करना देश की प्रमुख आर्थिक,सामाजिक जरूरत है। कारपोरेट जगत के द्वारा युवाओं को मानव संसाधन बनाने के लिए वित्तीय सहयोग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए अधिक से अधिक प्रयासों की जरूरत अनुभव की जा रही है। हम आशा करें कि एक ऐसे समय में जब देश में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है, तब समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों के जीवन को गुणवत्तापूर्ण बनाने तथा उन्हें आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक सहारे से आगे बढ़ाने में मदद करने जैसे दायित्वों के निर्वहन के लिए कारपोरेट क्षेत्र अधिक जवाबदेह भूमिका निभाने के लिए आगे बढ़ेगा।