Sunday, November 17, 2019 03:43 PM

कालिका सहस्रनाम

-गतांक से आगे...

विचित्र रत्न-पृथिवी-कल्प-शाखि-तल-स्थिता।

रत्न-द्वीप-स्पुहृरद्-रक्त-सिंहासन-विलासिनी।। 111।।

षट्-चक्र-भेदन-करी परमानंद-रूपिणी।

सहस्र-दल-पद्यांतश्चंद्र-मण्डल-वर्तिनी।। 112।।

ब्रह्म-रूप-शिव-क्रोड-नाना-सुख-विलासिनी।

हर-विष्णु-विरंचींद्र-ग्रह-नायक-सेविता।। 113।।

शिवा शैवा च रुद्राणी तथैव शिव-वादिनी।

मातंगिनी श्रीमती च तथैवानंद-मेखला।। 114।।

डाकिनी योगिनी चैव तथोपयोगिनी मता।

माहेश्वरी वैष्णवी च भ्रामरी शिव-रूपिणी।। 115।।

अलम्बुषा वेग-वती क्रोध-रूपा सु-मेखला।

गांधारी हस्ति-जिह्वा च इडा चैव शुभर्ज्री।। 116।।

पिंगला ब्रह्म-सूत्री च सुषुम्णा चैव गन्धिनी।

आत्म-योनिर्ब्रह्म-योनिर्जगद-योनिरयोनिजा।। 117।।

भग-रूपा भग-स्थात्री भगनी भग-रूपिणी।

भगात्मिका भगाधार-रूपिणी भग-मालिनी।। 118।।

लिंगाख्या चैव लिंगेशी त्रिपुरा-भैरवी तथा।

लिंग-गीतिः सुगीतिश्च लिंगस्था लिंग-रूप-धृव्।। 119।।

लिंग-माना लिंग-भवा लिंग-लिंगा च पार्वती।

भगवती कौशिकी च प्रेमा चैव प्रियंवदा।। 120।।