Monday, June 01, 2020 02:25 AM

काली छाया का पीछा करते शांता कुमार

एक साहित्यकार के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद शांता कुमार को समझना उतना ही टेढ़ा है, जितने कठोर रास्तों पर इन्होंने अपनी राजनीतिक पारियां लिखीं। जरूरी नहीं कि इन्होंने जो लिखा, उससे साहित्य जगत का इत्तफाक हो या राजनीति के बीच इन्हें कबूल किया गया हो, लेकिन इनका हर शब्द गवाही में मशगूल रहा और जो टपका, उसमें सत्यपूर्ण यथार्थ रहा। इसलिए ‘भ्रष्टाचार का कड़वा सच’ में हर उल्लेख की कड़वाहट आज की सियासत को पसंद नहीं आएगी। उनके निशाने में ऐसे कई नेता सबसे ऊपर हैं, जो हमारे विधायक-सांसद या मंत्री बन जाते हैं। नौकरशाही की जी हुजूरी में भ्रष्टाचार की संलिप्तता पर प्रहार करते वह लिखते हैं, ‘भ्रष्टाचार के मामले में देश के नेता अधिक बदनाम हो गए हैं। मुझे उनसे कोई हमदर्दी नहीं है। पूरे देश की नौकरशाही नेताओं से भी अधिक भ्रष्ट है। उनके बिना कोई नेता भ्रष्टाचार नहीं कर सकता।’ शांता कुमार की अध्ययनशीलता से निकली किताब आंकड़ों की दुहाई देती है और वह कुछ चुनिंदा उदाहरणों की जमात लगाकर पूछते हैं कि जनता कब तक भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करेगी। केंद्रीय सरकारों की निष्क्रियता तथा न्यायपालिका और कार्यपालिका की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा से कहीं विपरीत कमोबेश हर सत्ता का नशा परवान चढ़ रहा है। अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव, सारा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी कार्रवाइयों की प्रतीक्षा में सत्ता परिवर्तन तो कर गया, लेकिन काले धन के सवाल पर केंद्र सरकार की रहस्यपूर्ण निष्क्रियता का उन्हें मलाल है। काले धन की शिनाख्त में किताब खुले मन से व्यवस्था की खामियां बटोरती है। स्विस बैंकों में सत्तर लाख करोड़ भारतीय धन की काली छाया का पीछा करते हुए शांता कुमार अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप सुझाव दे डालते हैं। यह भी विडंबना है कि भारतीय जनता पार्टी के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य के सारे सुझाव किताब के प्रकाशन को प्रासंगिक बनाते हैं, लेकिन संसदीय पहल के इरादों का जिक्र वह अपनी भाजपा सरकार के कानों में नहीं कर पाते। लेखक का मानना है कि देश संसद में कानून बनाकर विदेशों में गलत तरीके से पहुंचाए धन को राष्ट्रीय अपराध बना सकता है। पुस्तक में उदाहरणों के साथ नसीहतें भी हैं, लेकिन ये भी कहीं न कहीं शांता कुमार की सियासी पसंद बन जाती हैं। वह मधु कोड़ा, कर्नाटक हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दिनाकरण व श्री ए. राजा की कुंडलियां खोलते-खोलते राहुल गांधी पर कटाक्ष करते हैं। पुस्तक में अपनी कठोरता का जिक्र करते हुए शांता कुमार बताते हैं कि किस तरह उन्होंने 1990 में बतौर मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव से स्पष्टीकरण मांगा और दो आईएएस अधिकारियों को इसलिए निलंबित कर दिया क्योंकि इन तीनों अधिकारियों ने एक अन्य अधिकारी के भ्रष्टाचार पर पर्दा डाला था। यह किताब व्यवस्थागत सुधारों की ओर कई तथ्यपुष्ट संदर्भों को जोड़ते हुए साबित करती है कि किस तरह गरीब व गरीबी के नाम पर काला धन पैदा होता रहा है। खास तौर पर खाद्य आपूर्ति व सबसिडी के मकड़जाल में फंसे देश को वह वित्तीय अनुशासन की सीख देते हैं। गरीबी मिटाने की तमाम संज्ञाओं और संज्ञानों की मिट्टी उठा कर किताब के संकल्प समझे जाएं, तो देश नक्सलवाद व टैक्स चोरी के अभिशाप से मुक्त हो जाएगा। शांता कुमार अमीर होते नेताओं, नौकरशाहों के साथ मंदिरों की भव्यता में ओढ़े गए धन पर भी प्रश्न उठाते हुए, धर्म की बैसाखियां तोड़ते हैं। वह जनप्रतिनिधियों के लगातार बढ़ते वेतन-भत्तों के बीच कहीं भारतीय गरीब की सिसकियां सुनते हैं, तो गरीबी के पन्नों को उद्धृत करते हुए क्रांतिकारी उद्घोष सुनाते हैं ः

जिस खेत से दहकान को मयस्सर हो न रोटी

उस खेत के गोशाए गंदम को जला दो।

पुस्तक के एक छोर पर संघ परिवार, विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रवाद और राम मंदिर आंदोलन भी आकर खड़ा हो जाता है। उनके गृह नगर पालमपुर में 1989 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में जो प्रस्ताव आया, उसके बगल में खड़े लालकृष्ण आडवाणी की निजी राय का जिक्र भी भावुक है, ‘शांता कुमार जी, मैं भी हिंदू हूं और किसी से कम हिंदू नहीं। आप संघ परिवार के सब नेताओं को समझाएं कि मस्जिद की जगह मंदिर बनाने का आग्रह न करें।’ पुस्तक के पचास निबंधों में कई तरह की कड़वी सच्चाई है, साथ ही साथ साफगोई से कहने की हिम्मत भी। अंत में वह न्यायपालिका के भीतर सुराख करते लोगों व इसके अवमूल्यन को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। भारत को विश्व गुरु की चारित्रिक ऊष्मा तक लौटने के लिए हर संस्था को मनीषी होना पड़ेगा, क्योंकि जब सिकंदर भारत विजय को चला तो उसके गुरु ने कहा कि वह भारत से गंगाजल और एक गुरु लेकर आए। यह पुस्तक शांता कुमार के लेखकीय कर्म का उनके सार्वजनिक जीवन से एक तरह मिलन करवाती है। राष्ट्रीय उत्थान के पन्नों पर शांता कुमार जो अपने जीवन से खोज पाए, उसके अक्स में यह कृति इतनी गहराई ढूंढ लेती है कि देश से प्रेम करने वाले इसे पढ़ने के लिए खोजते रहेंगे।

-निर्मल असो