Friday, October 18, 2019 12:49 PM

कितने हिंदी हैं हम

जगदीश बाली

स्वतंत्र लेखक

चार अक्तूबर 1977 को मंगलवार था जो हिंदी भाषा और हिंदोस्तान के लिए गौरवशाली दिन बना क्योंकि उस दिन तत्कालीन सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में आम सभा के 32वें अधिवेशन में हिंदी में भाषण दिया था। विश्वपटल पर इस गूंज ने हिंदी भाषा को एक अहम स्थान दिया। यूएन में पधारे प्रतिनिधियों ने खड़े होकर तालियां बजा कर वाजपेयी के इस भाषण का अभिनंदन किया था। हिंदी भाषा को प्रचारित और प्रसारित करने का इससे बेहतर व्यावहारिक उदाहरण व प्रयास क्या हो सकता है...

कुछ रोज पहले मैंने पड़ोस के एक बच्चे से कहा कि मेज पर रखे 10 सेब ले आओ। बच्चा चुपचाप खड़ा रहा और सेब लाने के लिए नहीं बढ़ा। मैने फिर कहा। बच्चा थोड़ा झिझकते हुए बोला कि दस कितने होते हैं? अंकल। मैनें अंग्रेजी में कहा कि दस ‘टैन’ होते हैं। बच्चा प्टाक से दस सेब ले आया। मुझे अचरज हुआ। बच्चा दस नहीं समझ पाया, परंतु टैन समझ गया। मुझे लगा देश की बिंदी हिंदी के प्रति हमारा नजरिया कितना उदासीन व तुच्छ है। उधर एक वो 4 अक्टूबर 1977 का मंगलवार था जो हिंदी भाषा और हिंदोस्तान के लिए गौरवशाली दिन बना क्योंकि उस दिन तत्कालीन सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ आम सभा के 32वें अधिवेशन में हिंदी में भाषण दिया था। विश्वपटल पर इस गूंज ने हिंदी भाषा को एक अहम स्थान दिया। यूएन में पधारे प्रतिनिधियों ने खड़े होकर तालियां बजा कर वाजपेयी के इस भाषण का अभिनंदन किया था। हिंदी भाषा को प्रचारित और प्रसारित करने का इससे बेहतर व्यावहारिक उदाहरण व प्रयास क्या हो सकता है। क्या आज हिंदी के पैरोकार व हमारा हिंदी के प्रति नजरिया ऐसा ही व्यावहारिक है? हम गर्व से तो कहते हैं कि हिंदी हमारी बिंदी है, पर धरातल पर इस भाषा को खास तरजीह नहीं देते। क्या हम ऐसा माहौल या परिवेश बना पा रहे हैं जहां कहा जा सके कि हिंदी हमारी जनमानस की भाषा है। पैदा होने के बाद निःसंदेह बच्चा अपने मां-बाप व आस-पास के वातावरण से सीखता है। वह जिस भाषा को सुनता है, वह वही भाषा बोलता है। सबसे पहले बच्चा मां से बोलना सीखता है और बड़ी सहजता से उसी भाषा को  अपनाता है।

अकसर देखा जाता है कि जब बच्चा बंदर को बंदर बोलता है तो मां कहती हैं, बंदर नहीं बेटा ‘मंकी’ बोलो। वह कहती है घोड़ा नहीं ‘हॉर्स’ बोलो, नाक नहीं ‘नोज’ बोलो। कभी तो वो नोज को नोजी और हैंड को हैंडु भी बोल देती है। क्या बंदर को मंकी या घोड़े को हॉर्स बोलने से बंदर या घोड़े की शक्लें बढि़या दिखती हैं? शायद माताएं ये मानती हैं कि हिंदी के बजाय अंग्रेजी बोलने से उनके बच्चे अधिक प्रतिभाशाली बनेंगे। मुझे माता-पिता के अपने बच्चों को अंग्रेजी शब्द सिखाने पर कोई आपत्ति नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं, परंतु हिंदी की बिंदी वाले इस देश में हमारे लिए बंदर, घोड़ा, हाथ पहले है मंकी, हॉर्स व हैंड बाद में। बंदर को मंकी या घोड़े को हॉर्स बोलने का प्रतिभा से कोई संबंध नहीं। गिनती को हिंदी में एक, दो, तीन के बजाय अंग्रेजी में वन, टू, थ्री कहने से कोई ज्यादा सभ्य नहीं हो जाता। नमस्ते की जगह गुड्मार्निग कहने से बच्चा खास नहीं हो जाता बल्कि ये सब बातें इस बात का द्योतक है कि जाने-अनजाने हम अभी भी मानसिक रूप से भाषाई गुलामी के दौर से उबर नहीं पा रहे हैं। ये बात उचित है कि बच्चे को हिंदी के अलावा अन्य भाषा का भी ज्ञान हो, परंतु उससे भी बेहतर है कि अन्य भाषा से पहले उसे हिंदी का ज्ञान हो। मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं अंग्रेजी का अध्यापक हूं, परंतु इससे भी ज्यादा गर्व मुझे इस बात पर है कि मैं हिंदी बोल सकता हूं और हिंदी लिख सकता हूं। स्कूल तो भाषा को सीखने, उसे उन्नत करने व विकसित करने की सबसे बेहतर जगह होती है। परंतु चिंता का विषय है कि स्कूलों में भी जब बच्चे हिंदी में बात-चीत करते हैं, तो वे अकसर हिंदी के सामान्य शब्दों का उच्चारण सही नहीं करते हैं। उनका वाक्य विन्यास भी बहुत गड़बड़ होता है। विद्यालय की प्रातः कालीन सभा में भी बच्चे जब बोलते हैं, तो वे कई शब्दों का उच्चारण गलत करते हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जहां हिंदी उन्नत व विकसित होनी चाहिए, वहां हिंदी की नींव कमजोर दिखती है। कई पढ़े- लिखे भी उन्नासी और नवासी के अंतर में उलझ जाते हैं। जब गिनती के इन संख्याओं की बात आती है, तो अमूमन अंग्रेजी में सेवैंटीनाइन या ऐटिनाइन कहना ही पड़ता है। कई महानुभाव तो उन्नतीस व उन्नतालीस में भी उलझन में पड़ जाते हैं। इस तरह की भाषाई उलझने हमारे हिंदी के प्रति रवैये की पोल खोलती हैं। एक जमाना था कि रेडियो उद्घोषक को सूचना व मनोरंजन के अलावा शुद्ध हिंदी के लिए भी सुना व जाना जाता था, परंतु आजकल कुछ उद्घोषकों के हिंदी शब्द उच्चारण की खामियां आसानी से सामने आ जाती हैं। कौन भूल सकता है जसदेव सिंह, सुशील दोशी, रवि चतुर्बेदी, मुर्ली मनोहर मंजुल जैसे कॉमैंटेटरों की हिंदी की जादुई आवाज को जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थी। उनको सुनना आनंद तो देता ही था, परंतु साथ में हम हिंदी भाषा के शब्द, उनका उच्चारण और लहजे के बारे में काफी कुछ सीख जाते थे। आजकल कुछ कॉमैंटेटर तो हिंदी की ऐसी खिचड़ी पेश करते हैं कि कबीर की सधुक्कड़ी गश खा जाए। उनको सुन कर हिंदी कॉमैंटेरी का जायका ऐसा बिगड़ता है कि सुनने वाला यही कहता है ऐसी हिंदी कॉमैंटरी का तो बस खुदा ही मालिक। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हिंदी को किसी तरह का खतरा है। हिंदी तो पूरे विश्व में फल-फूल रही है। परंतु हिंदी को सम्मान का मतलब है इसे अपने दिल की भाषा जान कर सम्मान से अपने जीवन में अपनाना। इस सोच को बदलना होगा कि अंग्रेजी बोलने से आदमी विद्वान बन जाता है और हिंदी बोलने वाला अज्ञानी रह जाता है। हम बढि़या हिंदी बोलें और लिखें और हमारे बच्चे भी बढि़या हिंदी बोले और लिखें। जब हर घर में बढि़या हिंदी होगी तभी हम कह सकते हैं, हां हिंदी हैं हम।