Monday, June 24, 2019 04:21 PM

किताबें मिली

कोटधारा री कलम

बिलासपुर निवासी लेखक कर्नल जसवंत सिंह चंदेल का कहलूरी कविता संग्रह ‘कोटधारा री कलम’ पाठकों के समक्ष है। इस कविता संग्रह में 100 कविताएं 122 पृष्ठों में समेटी गई हैं। कहीं ग्रामीण परिवेश उमड़ आया है, तो कहीं सेना व उसके जवानों का गुणगान है। इसी तरह कई कविताएं सामाजिक विषयों को लेकर लिखी गई हैं। स्थानीय धार्मिक रीति-रिवाजों, संस्कृति, परंपराओं व मेलों तथा मंदिरों को लेकर भी कई कविताएं लिखी गई हैं। ‘लाडि़या रा गुलाम’ जैसी कविताएं जहां पाठकों का मनोरंजन करती हैं, वहीं कुछ न कुछ सामाजिक संदेश भी देती हैं। विषयों की विविधता इस काव्य संग्रह की बड़ी विशेषता है। सभी कविताएं कहलूरी भाषा में लिखी गई हैं और साहित्य लेखन परंपरा पर भी व्यापक विचार-विमर्श हुआ है। अच्छे कागज पर छपाई के साथ काव्य संग्रह आकर्षक बन पड़ा है तथा यह अशुद्धियों से रहित है। आम बोलचाल की भाषा पाठकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है। आशा है कि यह काव्य संग्रह पाठकों को पसंद आएगा। काव्य संग्रह में विषय की विविधता व विस्तार को देखते हुए इसका मूल्य उचित ही लगता है।

कोटधारा री कलम: कर्नल जसवंत सिंह चंदेल, शंकर प्रिंटिंग प्रेस घुमारवीं, 200 रुपए

                                                        -राजेंद्र ठाकुर

मैं और मेरी एसएसबी

लेखक रविंद्र सिंह ठाकुर की ‘मैं और मेरी एसएसबी’ पुस्तक वर्तमान परिप्रेक्ष्य को उजागर करती भारतीय सीमाओं की सुरक्षा के बारे में बता रही है। भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमाओं की पुरानी भूमिका के मद्देनजर वर्तमान में इन सीमाओं की सुरक्षा पर आशंका व्यक्त की गई है। 1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण और वर्तमान में भारत-नेपाल की सीमा से आईएसआई के एजेंटों की बढ़ती घुसपैठ के मद्देनजर आज यह तथ्य मिथक ही साबित हुआ है कि हिमाचल-नेपाल सीमा अभेद्य है। ऐसे में देश की सुरक्षा में सीमाओं की बढ़ती महत्ता को देखकर भारत-नेपाल की सीमाओं पर सशस्त्र सीमा बलों का चुनाव उपयुक्त और अनिवार्य विकल्प है। 204 पन्नों में सिमटी इस किताब के माध्यम से लेखक ने एसएसबी में हुए परिवर्तन के उस अचंभित करने वाले पक्ष को उजागर किया है, जहां वर्तमान एसएसबी का आपसी भाईचारे  व परिवारपन से अलगाव हो चुका है और यह भी महज एक बल तक सीमित होकर रह गया है। यह पुस्तक इसी संदर्भ की व्याख्या है कि सीमाओं पर सुरक्षा बहाली और प्रबंधन के लिए एसएसबी का चुनाव सार्थक ही है। पुस्तक का एक भाग चित्रों के लिए समर्पित है जिसमें इस सुरक्षा बल के प्रशिक्षण को लेकर अनेक पहलू उद्घाटित हुए हैं।   

मैं और मेरी एसएसबी: रविंद्र सिंह ठाकुर, नंदी प्रकाशन, सोलन, 250 रुपए

                                                  -पूजा चौधरी

     गुग्गा जाहरपीर

‘गुग्गा जाहरपीर’ नामक पुस्तक में बिलासपुर लेखक संघ ने पूरी लग्न और शिद्दत के साथ गुग्गा जी की महान गाथाओं का उल्लेख किया है। इस संदर्भ में जानकारी एकत्रित करने के लिए उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया गया है। गुग्गा जाहरपीर की वंशावली, गुरु गोरखनाथ का प्रादुर्भाव, माता बाछल का जन्म, उनकी शादी, गुरु गोरखनाथ को गुरु बनाना, माता बाछल को पुत्रोत्पत्ति, रानी बाछल का धोखा, सांपों की लड़ाई से लेकर गुग्गा जी के युद्ध और विवाह से लेकर उनके छपन होने के रहस्यों से पर्दा उठाया गया है। वैसे तो उनके विषय में कई जनश्रुतियां प्रचलित हैं, लेकिन इसके बावजूद बिलासपुर लेखक संघ ने इस पुस्तक में सुंदर चित्रों के साथ उनकी छवि को उजागर किया है।

गुग्गा जाहरपीर की पूजा समस्त जगत में सदियों से चली आ रही है। हर जगह पर इनके मंदिर हैं। गुग्गा जी को सर्पों का देवता माना जाता है और प्राणों की रक्षा के लिए लोग इनकी शरण में आते हैं। गुग्गा जी के दरबार में सांप के जहर का असर नहीं होता। कुल मिलाकर देखा जाए तो बिलासपुर लेखक संघ ने गुग्गा जी जैसे महान संत की गाथाओं को अपने शब्दों में दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास किया है और उनका यह प्रयास सराहनीय भी है। कुल 79 पृष्ठों की यह किताब धार्मिक श्रेणी में रखी जा सकती है। किताब की भाषा सरल है तथा इसकी कीमत भी ज्यादा नहीं है। धार्मिक विषयों में रुचि रखने वाले लोगों को यह किताब बहुत पसंद आएगी, ऐसा विश्वास है।

गुग्गा जाहरपीर: बिलासपुर लेखक संघ, शंकर प्रिंटिंग प्रेस घुमारवीं, 120

                                                            -लता शर्मा