Monday, June 01, 2020 01:47 AM

किताबों से गर्द हटाने का वक्त

राजेंद्र राजन

मो.-8219158269

कर्फ्यू के भीतर साहित्यिक जिंदगी-4

मन के ताले खोले बैठे साहित्य जगत के सृजन को कर्फ्यू कतई मंजूर नहीं। मुखातिब विमर्श की नई सतह पर और विराम हुई जिंदगी के बीचों-बीच साहित्य कर्मी की उर्वरता का कमाल है कि कर्फ्यू भी सृजन के नैन-नक्श में एक आकृति बन जाता है। ऐसे दौर को हिमाचल के साहित्यकारों, लेखकों और पत्रकारों ने कैसे महसूस किया, कुछ नए को कहने की कोशिश में हम ला रहे हैं यह नई शृांखला और पेश है इसकी चौथी किस्त...

‘गुलों में रंग भरे वादा-ए-नौबहार चले। चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले।’ फैज़ का गुलशन कितना वीरान है। रचना के लिए जिस सुकून की दरकार होती है वो गायब है। सोशल मीडिया, मोबाइल, टीवी, अखबारों के ई-संस्करणों से मोहभंग की स्थिति है। निगाह उन किताबों, पत्रिकाओं पर टिकी जिन्हें सहेजने के लिए मुझे बेशुमार यातनाओं से गुजरना पड़ा था। ‘सारिका’ के 40-45 साल पुराने 200 अंक मिले। इनमें से विशेषांक ढूंढे तो सितंबर 1981 में सारिका में चीन के महान लेखक, क्रांतिकारी व विचारक का विशेषांक हाथ लगा। उनके उपन्यास का संक्षिप्त रूपांतर इसी अंक में पढ़ा-‘आ क्यू की सच्ची कहानी।’ उनकी कहानियां और संस्मरण भी। लू शुन मानते थे कि, ‘रचनात्मक साहित्य सिद्धांतों से नहीं, अनुभवों से लिखा जाता है।’ माओ लू शुन के मुरीद थे। चीन में ‘मांचू’ के क्रूर व बर्बर सामंतवाद के खिलाफ  क्रांति के लिए जमीन तैयार करने में लू शुन के विचारों व साहित्य का बड़ा हाथ रहा। सारिका का ही ‘मैक्सिम गोर्की’ विशेषांक नवंबर 1986 में छपा था। तब मैं नाहन में डीपीआरओ के पद पर तैनात था। तंग सी गली में पत्रिकाओं की दुकान थी। यहीं से ‘सारिका’ के अंकों के आने की प्रतीक्षा रहती थी। लू शुन अगर चीन में सृजन में सक्रिय थे, तो उसी दौर में गोर्की रूस में और प्रेमचंद भारत में। ‘मां’ उपन्यास गोर्की का ऐसा उपन्यास है, जिसने विश्व में अनेक देशों में क्रांतियों के लिए लोगों को प्रेरित किया। 1926 में इस पर मूक फिल्म भी बनी थी। पति के अत्याचार झेलने, गुरबत से लड़ने के बावजूद एक दिन वो रूस के पूरे समाज को जारशाही के विरुद्ध क्रांति करने के लिए नेतृत्व की भूमिका में आ जाती है। लेनिन, गोर्की के साहित्य से प्रभावित थे। इसी अंक में गोर्की की कहानियां भी पढ़ीं। उनके संस्मरण भी।

जाना कि कैसे भुखमरी से लड़ता झुग्गी-झोंपड़ी नुमा अंधेरे, सीलन भरे कमरों में रहने वाला गोर्की एक दिन दुनिया का महान लेखक बन गया। फरवरी 1977 में सारिका के एक अंक में जितेंद्र भाटिया का संपूर्ण उपन्यास ‘समय सीमांत’ पढ़ा। कैसे एक युवक कस्बे से निकलकर मुंबई में क्रिएटिविटी के सहारे जिजीविषा की तलाश में अपना अस्तित्व और अहमियत खो देता है। यही इस पुस्तक का द्वंद्व है। अक्तूबर 2005 में ‘वर्तमान साहित्य’ ने सुभद्रा कुमारी चौहान पर अंक छापा था। हम लेखिका को शायद उसकी एक कविता से ही जानते थे- ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।’ मगर वे और उनके पति लक्ष्मण सिंह चौहान सच्चे देशभक्त और क्रांतिकारी थे। सुभद्रा के साहित्य ने 1920 से 1947 तक करोड़ों देशवासियों को स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित किया था। इसी अंक में उनकी कहानियां ‘पापी पेट’, ‘वेश्या की लड़की’, ‘तांगेवाला’, ‘हींग वाला’ व ‘सुभागी’ पढ़ी। वर्तमान साहित्य का ही 1997 का एक अंक नाटकों व फिल्मों पर केंद्रित था। इसमें अंबाला के स्वदेश दीपक का नाटक ‘जलता हुआ रथ’ पढ़ा जो 1984 के दिल्ली में सिख दंगों से प्रेरित था। यूं वे अपने एक खूब चर्चित नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ के लिए जाने गए। सन् 2000 में वागर्थ का सार्वभौम कहानी विशेषांक छपा था। तब इसके संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय थे। इस अंक में दुनिया भर के चुनिंदा लेखकों की कालजयी कहानियां संकलित हैं, जो मैंने चाव से पढ़ डालीं। कबूतर (पोलैंड), अक्षर और देह (इटली), फ्रांसिस कोचवान (फ्रांस) और मीनाक्षी (मैथिली) कुछेक ऐसी कहानियां हैं जिन्हें पढ़कर मुझे लगा कि यशपाल, प्रेमचंद के बाद का दौर हिंदी कहानी में दरिद्रता का संकटकाल प्रतीत होता है। गत एक माह में ‘गोदान’ को पुनर्पाठ किया। प्रेमचंद का ‘होरी’ किसान मुझे 100 साल बाद भी देश के हर किसान में दिखाई देता है। अंतहीन यातना शिविर से गुजरता। आत्महत्या को अंगीकार करने के लिए तत्पर सा। हाल ही में दिवंगत हुए गिरिराज किशोर के 900 पृष्ठों के वृहद उपन्यास को पढ़ना मुझे 10 साल से असहज लग रहा था। 1890 से 1900 तक के मध्य अंग्रेज भारतीय प्रवासी मजदूरों को पानी के जहाजों में भर-भर कर ले गए थे।

गोरों ने इन गिरमिटिया मजदूरों का गुलामों की तरह शोषण किया और कुलीगरी करने आए हजारों मजदूर आत्महत्या को बाध्य हुए। गांधी के मोहनदास से महात्मा बनने की कहानी दक्षिण अफ्रीका से ही शुरू होती है जहां वे आत्मघाती हमलों के बावजूद गिरमिटियों की जंग लड़ते रहे। इसके 200 पृष्ठ पढ़ने के बाद लगा कि गांधी को ‘फिक्शन’ में करीब से समझने के लिए ‘पहला गिरमिटिया’ से बेहतर शायद दूसरी कोई किताब नहीं हो सकती। चालीस साल से इकट्ठा हो रही लाइब्रेरी की किताबों और पत्रिकाओं से गर्द साफ  करने के बाद कुछ पुरस्कृत फिल्में भी देखीं, दिल्ली से यहां आकर लॉकडाउन में फंस गई बेटी व दो नातियों के साथ। ‘नवल-द-ज्वैल’, ‘किताब’, ‘मधुबनी - स्टेशन ऑफ  कलर्स’ और 1925 में बनी सरगेई की ‘बैटलशिप पोटेमकिन’। बच्चों ने भी कुछ किताबें पढ़ी और फिल्मों पर जमकर चर्चा की। 1960 में बनी फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ की याद भी आई कि इक रोज वायरस का भय दूर होगा और यह अंधेरा छंटेगा।