किसी अजूबे से कम नहीं हैं महाभारत के पात्र

शंकर ने प्रसन्न होकर उसे वर देने की इच्छा की। उसने शंकर से पांच बार कहा कि वह सर्वगुणसंपन्न पति चाहती है। शंकर ने कहा कि अगले जन्म में उसके पांच भरतवंशी पति होंगे क्योंकि उसने पति पाने की कामना पांच बार दोहराई थी। जब पांडव तथा कौरव राजकुमारों की शिक्षा पूर्ण हो गई तो उन्होंने द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा देनी चाही। द्रोणाचार्य को द्रुपद के द्वारा किए गए अपने अपमान का स्मरण हो आया और उन्होंने राजकुमारों से कहा, ‘राजकुमारो! यदि तुम गुरुदक्षिणा देना ही चाहते हो तो पांचाल नरेश द्रुपद को बंदी बना कर मेरे समक्ष प्रस्तुत करो। यही तुम लोगों की गुरुदक्षिणा होगी।’ गुरुदेव के इस प्रकार कहने पर समस्त राजकुमार अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर पांचाल देश की ओर चले...

-गतांक से आगे...

शंकर ने प्रसन्न होकर उसे वर देने की इच्छा की। उसने शंकर से पांच बार कहा कि वह सर्वगुणसंपन्न पति चाहती है। शंकर ने कहा कि अगले जन्म में उसके पांच भरतवंशी पति होंगे क्योंकि उसने पति पाने की कामना पांच बार दोहराई थी। जब पांडव तथा कौरव राजकुमारों की शिक्षा पूर्ण हो गई तो उन्होंने द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा देनी चाही। द्रोणाचार्य को द्रुपद के द्वारा किए गए अपने अपमान का स्मरण हो आया और उन्होंने राजकुमारों से कहा, ‘राजकुमारो! यदि तुम गुरुदक्षिणा देना ही चाहते हो तो पांचाल नरेश द्रुपद को बंदी बना कर मेरे समक्ष प्रस्तुत करो। यही तुम लोगों की गुरुदक्षिणा होगी।’ गुरुदेव के इस प्रकार कहने पर समस्त राजकुमार अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर पांचाल देश की ओर चले। पांचाल पहुंचने पर अर्जुन ने द्रोणाचार्य से कहा, ‘गुरुदेव! आप पहले कौरवों को राजा द्रुपद से युद्ध करने की आज्ञा दीजिए। यदि वे द्रुपद को बंदी बनाने में असफल रहे तो हम पांडव युद्ध करेंगे।’ गुरु की आज्ञा मिलने पर दुर्योधन के नेतृत्व में कौरवों ने पांचाल पर आक्रमण कर दिया। दोनों पक्षों के मध्य भयंकर युद्ध होने लगा, किंतु अंत में कौरव परास्त होकर भाग निकले। कौरवों को पलायन करते देख पांडवों ने आक्रमण आरंभ कर दिया। भीमसेन तथा अर्जुन के पराक्रम के समक्ष पांचाल नरेश की सेना हार गई। अर्जुन ने आगे बढ़ कर द्रुपद को बंदी बना लिया और गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष ले आए। द्रुपद को बंदी के रूप में देख कर द्रोणाचार्य ने कहा, ‘हे द्रुपद! अब तुम्हारे राज्य का स्वामी मैं हो गया हूं। मैं तो तुम्हें अपना मित्र समझ कर तुम्हारे पास आया था किंतु तुमने मुझे अपना मित्र स्वीकार नहीं किया था। अब बताओ क्या तुम मेरी मित्रता स्वीकार करते हो?’ द्रुपद ने लज्जा से सिर झुका लिया और अपनी भूल के लिए क्षमायाचना करते हुए बोले, ‘हे द्रोण! आपको अपना मित्र न मानना मेरी भूल थी और उसके लिए अब मेरे हृदय में पश्चाताप है। मैं तथा मेरा राज्य दोनों ही अब आपके अधीन हैं, अब आपकी जो इच्छा हो, करें।’ द्रोणाचार्य ने कहा, ‘तुमने कहा था कि मित्रता समान वर्ग के लोगों में होती है। अतः मैं तुमसे बराबरी का मित्र भाव रखने के लिए तुम्हें तुम्हारा आधा राज्य लौटा रहा हूं।’ इतना कह कर द्रोणाचार्य ने गंगा नदी के दक्षिणी तट का राज्य द्रुपद को सौंप दिया और शेष को स्वयं रख लिया। गुरु द्रोण से पराजित होने के उपरांत महाराज द्रुपद अत्यंत लज्जित हुए और उन्हें किसी प्रकार से नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे। इसी चिंता में एक बार वे घूमते हुए कल्याणी नगरी के ब्राह्मणों की बस्ती में जा पहुंचे। वहां उनकी भेंट याज तथा उपयाज नामक महान कर्मकांडी ब्राह्मण भाइयों से हुई। राजा द्रुपद ने उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया एवं उनसे द्रोणाचार्य के मारने का उपाय पूछा। उनके पूछने पर बड़े भाई याज ने कहा, ‘इसके लिए आप एक विशाल यज्ञ का आयोजन करके अग्निदेव को प्रसन्न कीजिए जिससे कि वे आपको महान बलशाली पुत्र का वरदान दे देंगे।’ महाराज ने याज और उपयाज से उनके कहे अनुसार यज्ञ करवाया। उनके यज्ञ से प्रसन्न होकर अग्निदेव ने उन्हें एक ऐसा पुत्र दिया जो संपूर्ण आयुध एवं कवच कुंडल से युक्त था।             

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