Tuesday, November 12, 2019 09:38 AM

किसी अजूबे से कम नहीं हैं महाभारत के पात्र

शकुनि का जन्म गंधार के सम्राट सुबल तथा साम्राज्ञी सुदर्मा के यहां हुआ था। शकुनि की बहन गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से हुआ था। शकुनि की कुरुवंश के प्रति घृणा का कारण यह था कि हस्तिनापुर के सेनापति भीष्म एक बार धृतराष्ट्र के लिए गांधारी का हाथ मांगने गंधार गए। तब गांधारी के पिता सुबल ने यह बात स्वीकार कर ली, लेकिन उस समय उन्हें यह पता नहीं था कि धृतराष्ट्र जन्मांध है। इसका शकुनि ने भी विरोध किया, लेकिन गांधारी अब तक धृतराष्ट्र को अपना पति मान चुकी थी। इसलिए शकुनि ने उस दिन यह प्रण लिया कि वह समूचे कुरुवंश के सर्वनाश का कारण बनेगा...

-गतांक से आगे...

जन्म

शकुनि का जन्म गंधार के सम्राट सुबल तथा साम्राज्ञी सुदर्मा के यहां हुआ था। शकुनि की बहन गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से हुआ था। शकुनि की कुरुवंश के प्रति घृणा का कारण यह था कि हस्तिनापुर के सेनापति भीष्म एक बार धृतराष्ट्र के लिए गांधारी का हाथ मांगने गंधार गए। तब गांधारी के पिता सुबल ने यह बात स्वीकार कर ली, लेकिन उस समय उन्हें यह पता नहीं था कि धृतराष्ट्र जन्मांध है। इसका शकुनि ने भी विरोध किया, लेकिन गांधारी अब तक धृतराष्ट्र को अपना पति मान चुकी थी। इसलिए शकुनि ने उस दिन यह प्रण लिया कि वह समूचे कुरुवंश के सर्वनाश का कारण बनेगा।

चौसर का खेल

हस्तिनापुर राज्य को दो बराबर टुकड़ों में बांटकर एक भाग, जो कि पूर्णतः बंजर था, पांडवों को दे दिया गया जिसे उन्होंने अपने अथक प्रयासों से इंद्रप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली) नामक सुंदर नगरी में परिवर्तित कर दिया। शीघ्र ही वहां की भव्यता की चर्चाएं दूर-दूर तक होने लगीं। युधिष्ठिर द्वारा किए गए राजसूय यज्ञ के अवसर पर, दुर्योधन को भी उस भव्य नगरी में जाने का अवसर मिला। वह राजमहल की भव्यता देख रहा था कि एक स्थान पर उसने पानी की तल वाली सजावट को ठोस भूमि समझ लिया और पानी में गिर गया। इसे दुर्योधन ने अपना अपमान समझा और वह हस्तिनापुर लौट आया। अपने भांजे की यह मानसिक स्थिति भांपकर शकुनि ने मन में पांडवों का राजपाठ छीनने का कुटिल विचार बना लिया। उसने पांडवों को चौसर के खेल के लिए आमंत्रित किया और अपनी कुटिल बुद्धि के प्रयोग से युधिष्ठिर को पहले तो छोटे-छोटे दाव लगाने के लिए कहा। जब युधिष्ठिर खेल छोड़ने का मन बनाता तो शकुनि द्वारा कुछ न कुछ कहकर युधिष्ठिर से कोई न कोई दाव लगवा लेता। इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर एक-एक कर अपनी सभी वस्तुओं को दाव पर लगा कर हारते रहे और अंत में उन्होंने अपने भाइयों और अपनी पत्नी को भी दाव पर लगा दिया और उन्हें भी हार गए। इस प्रकार द्रौपदी का अपमान करके दुर्योधन ने अपना प्रतिशोध ले लिया और उसी दिन महाभारत के युद्ध की नींव पड़ी।

कुरुक्षेत्र का युद्ध

कुरुक्षेत्र के युद्ध में शकुनि का वध सहदेव के द्वारा 18वें दिन के युद्ध में किया गया। उसके सभी भाइयों का वध इरवन और अर्जुन के द्वारा किया गया।

द्रोणाचार्य

द्रोणाचार्य ऋषि भारद्वाज तथा घृतार्ची नामक अप्सरा के पुत्र तथा धर्नुविद्या में निपुण परशुराम के शिष्य थे। कुरू प्रदेश में पांडु के पांचों पुत्र तथा धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के वे गुरु थे। महाभारत युद्ध के समय वह कौरव पक्ष के सेनापति थे। गुरु द्रोणाचार्य के अन्य शिष्यों में एकलव्य का नाम उल्लेखनीय है। उसने गुरुदक्षिणा में अपना अंगूठा द्रोणाचार्य को दे दिया था। कौरवों और पांडवों ने द्रोणाचार्य के आश्रम में ही अस्त्रों और शस्त्रों की शिक्षा पाई थी। अर्जुन द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे।