किसी अजूबे से कम नहीं हैं महाभारत के पात्र

मुनि के शाप के कारण ही धर्मराज को विदुर जी का अवतार लेना पड़ा था। वे काल की गति को भली-भांति जानते थे। उन्होंने अपने बड़े भ्राता धृतराष्ट्र को समझाया कि महाराज! अब भविष्य में बड़ा बुरा समय आने वाला है। आप यहां से तुरंत वन की ओर निकल चलिए। कराल काल शीघ्र ही यहां आने वाला है जिसे संसार का कोई भी प्राणी टाल नहीं सकता। आपके पुत्र-पौत्रादि सभी नष्ट हो चुके हैं और वृद्धावस्था के कारण आपके इंद्रिय भी शिथिल हो गई हैं। आपने इन पांडवों को महान क्लेश दिए, उन्हें मरवाने की कुचेष्टा की, उनकी पत्नी द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित किया और उनका राज्य छीन लिया। फिर भी उन्हीं का अन्न खाकर अपने शरीर को पाल रहे हैं और भीमसेन के दुर्वचन सुनते रहते हैं...

-गतांक से आगे...

मांडव्य ऋषि ने धर्मराज को श्राप दे दिया था, इसी कारण वे सौ वर्ष पर्यंत शूद्र बन कर रहे। एक समय एक राजा के दूतों ने मांडव्य ऋषि के आश्रम पर कुछ चोरों को पकड़ा था। दूतों ने चोरों के साथ मांडव्य ऋषि को भी चोर समझ कर पकड़ लिया। राजा ने चोरों को सूली पर चढ़ाने की आज्ञा दी। उन चोरों के साथ मांडव्य ऋषि को भी सूली पर चढ़ा दिया गया, किंतु इस बात का पता लगते ही कि चोर नहीं हैं बल्कि ऋषि हैं, राजा ने उन्हें सूली से उतरवा कर अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी। मांडव्य ऋषि ने धर्मराज के पास पहुंच कर प्रश्न किया कि तुमने मुझे मेरे किस पाप के कारण सूली पर चढ़वाया, धर्मराज ने कहा कि आपने बचपन में एक टिड्डे को कुश की नोंक से छेदा था, इसी पाप में आप को यह दंड मिला। ऋषि बोले, ‘वह कार्य मैंने अज्ञानवश किया था और तुमने अज्ञानवश किए गए कार्य का इतना कठोर दंड देकर अपराध किया है। अतः तुम इसी कारण से सौ वर्ष तक शूद्र योनि में जन्म लेकर मृत्युलोक में रहो।’ मुनि के शाप के कारण ही धर्मराज को विदुर जी का अवतार लेना पड़ा था। वे काल की गति को भली-भांति जानते थे। उन्होंने अपने बड़े भ्राता धृतराष्ट्र को समझाया कि महाराज! अब भविष्य में बड़ा बुरा समय आने वाला है। आप यहां से तुरंत वन की ओर निकल चलिए। कराल काल शीघ्र ही यहां आने वाला है जिसे संसार का कोई भी प्राणी टाल नहीं सकता। आपके पुत्र-पौत्रादि सभी नष्ट हो चुके हैं और वृद्धावस्था के कारण आपके इंद्रिय भी शिथिल हो गई हैं। आपने इन पांडवों को महान क्लेश दिए, उन्हें मरवाने की कुचेष्टा की, उनकी पत्नी द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित किया और उनका राज्य छीन लिया। फिर भी उन्हीं का अन्न खाकर अपने शरीर को पाल रहे हैं और भीमसेन के दुर्वचन सुनते रहते हैं। आप मेरी बात मान कर संन्यास धारण कर शीघ्र ही चुपचाप यहां से उत्तराखंड की ओर चले जाइए। विदुर जी के इन वचनों से धृतराष्ट्र को प्रज्ञाचक्षु प्राप्त हो गए और वे उसी रात गांधारी को साथ लेकर चुपचाप विदुर जी के साथ वन को चले गए। प्रातःकाल संध्यावंदन से निवृत्त होकर ब्राह्मणों को गौ, भूमि और सुवर्ण दान करके जब युधिष्ठिर अपने गुरुजन धृतराष्ट्र, विदुर और गांधारी के दर्शन करने गए, तब उन्हें वहां न पाकर चिंतित हुए कि कहीं भीमसेन के कटुवचनों से त्रस्त होकर अथवा पुत्र शोक से दुखी होकर गंगा में तो नहीं डूब गए। यदि ऐसा है तो मैं ही अपराधी समझा जाऊंगा। वे उनके शोक से दुखी रहने लगे। एक दिन देवर्षि नारद अपने तम्बूरे के साथ वहां पधारे। युधिष्ठिर ने प्रणाम करके और यथोचित सत्कार के साथ आसन देकर उनसे विदुर, धृतराष्ट्र और गांधारी के विषय में प्रश्न किया। उनके इस प्रश्न पर नारद जी बोले, ‘हे युधिष्ठिर! तुम किसी प्रकार का शोक मत करो। यह संपूर्ण विश्व परमात्मा के वश में है और वही सबकी रक्षा करता है। तुम्हारा यह समझना कि मैं ही उनकी रक्षा करता हूं, तुम्हारी भूल है। यह संसार नश्वर है तथा जाने वालों के लिए शोक नहीं करना चाहिए। शोक का कारण केवल मोह ही है, इस मोह को त्याग दो।

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