किसी अजूबे से कम नहीं हैं महाभारत के पात्र

महाभारत के अनुसार पांडु हस्तिनापुर के महाराज विचित्रवीर्य और उनकी दूसरी पत्नी अम्बालिका के पुत्र थे। उनका जन्म महर्षि वेद व्यास के वरदान स्वरूप हुआ था। वे पांडवों के पिता और धृतराष्ट्र के कनिष्ठ भ्राता थे। जिस समय हस्तिनापुर का सिंहासन संभालने के लिए धृतराष्ट्र को मनोनीत किया जा रहा था, तब विदुर ने राजनीति ज्ञान की दुहाई दी कि एक नेत्रहीन व्यक्ति राजा नहीं हो सकता, तब पांडु को नरेश घोषित किया गया। एक बार महाराज पांडु अपनी दोनों रानियों कुंती और माद्री के साथ वन विहार कर रहे थे। एक दिन उन्होंने मृग के भ्रम में बाण चला दिया जो एक ऋषि को लग गया...

-गतांक से आगे...

यह पंचभौतिक शरीर नाशवान एवं काल के वश में है। तुम्हारे चाचा धृतराष्ट्र, माता गांधारी एवं विदुर उत्तराखंड में सप्तश्रोत नामक स्थान पर आश्रम बना कर रहते हैं। वे वहां तीनों काल स्नान करके अग्नहोत्र करते हैं और उनके संपूर्ण पाप धुल चुके हैं। अब उनकी कामनाएं भी शांत हो चुकी हैं। सदा भगवान के ध्यान में रहने के कारण तमोगुण, रजोगुण, सतोगुण और अहंकार बुद्धि नष्ट हो चुकी है। उन्होंने अपने आपको भगवान में लीन कर दिया है। अब मैं तुम्हें बताता हूं कि वे आज से पांचवें दिन अपने शरीर को त्याग देंगे। वन में अग्नि लग जाने के कारण वे उसी में भस्म हो जाएंगे। उनकी साध्वी पत्नी गांधारी भी उसी अग्नि में प्रवेश कर जाएंगी। फिर विदुर जी वहां से तीर्थयात्रा के लिए चले जाएंगे। अतः तुम उनके विषय में चिंता करना त्याग दो।’ इतना कह कर देवर्षि नारद आकाशमार्ग से स्वर्ग के लिए प्रस्थान कर गए। युधिष्ठिर ने देवर्षि नारद के उपदेश को समझ कर शोक का परित्याग कर दिया।

पांडु

महाभारत के अनुसार पांडु हस्तिनापुर के महाराज विचित्रवीर्य और उनकी दूसरी पत्नी अम्बालिका के पुत्र थे। उनका जन्म महर्षि वेद व्यास के वरदान स्वरूप हुआ था। वे पांडवों के पिता और धृतराष्ट्र के कनिष्ठ भ्राता थे। जिस समय हस्तिनापुर का सिंहासन संभालने के लिए धृतराष्ट्र को मनोनीत किया जा रहा था, तब विदुर ने राजनीति ज्ञान की दुहाई दी कि एक नेत्रहीन व्यक्ति राजा नहीं हो सकता, तब पांडु को नरेश घोषित किया गया। एक बार महाराज पांडु अपनी दोनों रानियों कुंती और माद्री के साथ वन विहार कर रहे थे। एक दिन उन्होंने मृग के भ्रम में बाण चला दिया जो एक ऋषि को लग गया। उस समय ऋषि अपनी पत्नी के साथ सहवासरत थे और उसी अवस्था में उन्हें बाण लग गया। इसलिए उन्होंने पांडु को श्राप दे दिया कि जिस अवस्था में उनकी मृत्यु हो रही है, उसी प्रकार जब भी पांडु अपनी पत्नियों के साथ सहवासरत होंगे तो उनकी भी मृत्यु हो जाएगी। उस समय पांडु की कोई संतान नहीं थी और इस कारण वे विचलित हो गए। यह बात उन्होंने अपनी बड़ी रानी कुंती को बताई। तब कुंती ने कहा कि ऋषि दुर्वासा ने उन्हें वरदान दिया था कि वे किसी भी देवता का आवाहन करके उनसे संतान प्राप्त सकती हैं। तब पांडु के कहने पर कुंती ने एक-एक कर कई देवताओं का आवाहन किया। इस प्रकार माद्री ने भी देवताओं का आवाहन किया। तब कुंती को तीन और माद्री को दो पुत्र प्राप्त हुए जिनमें युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ थे। कुंती के अन्य पुत्र थे भीम और अर्जुन तथा माद्री के पुत्र थे नकुल व सहदेव। एक दिन वर्षा ऋतु का समय था और पांडु और माद्री वन में विहार कर रहे थे। उस समय पांडु अपने काम वेग पर नियंत्रण न रख सके और माद्री के साथ सहवास किया। तब ऋषि का श्राप महाराज पांडु की मृत्यु के रूप में फलित हुआ।