किसी अजूबे से कम नहीं हैं महाभारत के पात्र

प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यंत रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनंदन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्चात् वहां भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर मांगने के लिए कहा। इस पर सत्यवती ने श्वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिए एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुए कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो, तब तुम्हारी मां पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करना और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना...

-गतांक से आगे...

उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है, न कि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना। वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्मे अवश्य थे, लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है। यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएं अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीं, वह शिक्षा जो 8 वर्ष से कम आयु वाले बालकों को दी जाती है।  वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। यहां तक कि कई खूंखार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे। उन्होंने सैन्य शिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी, लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण। उनके जाने-माने शिष्य थे ः भीष्म, द्रोण (कौरव-पांडवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता) एवं कर्ण। कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है। वह सदैव ही स्वयं को शुद्र समझता रहा, लेकिन उसका सामर्थ्य छुपा न रह सका। उसने परशुराम को यह बात नहीं बताई कि वह शुद्र वर्ण का है और भगवान परशुराम से शिक्षा प्राप्त कर ली। किंतु परशुराम वर्ण व्यवस्था को अनुचित मानते थे। यदि कर्ण उन्हें अपने शुद्र होने की बात बता भी देते तो भी भगवान परशुराम कर्ण के तेज और सामर्थ्य को देख उन्हें सहर्ष शिक्षा देने को तैयार हो जाते। किंतु जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया कि उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा, जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी। इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने-सामने होते हैं, तब वह अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।

जन्म

प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यंत रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनंदन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्चात् वहां भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर मांगने के लिए कहा। इस पर सत्यवती ने श्वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिए एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुए कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो, तब तुम्हारी मां पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करना और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिए गए इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग-अलग सेवन कर लेना। इधर जब सत्यवती की मां ने देखा कि भृगु ने अपनी पुत्रवधू को उत्तम संतान होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया।   

                                       -क्रमशः