Tuesday, September 29, 2020 04:31 PM

किसी अजूबे से कम नहीं हैं महाभारत के पात्र

उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुंच कर प्रथम तो स्वयं को ‘विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही’ बताते हुए ‘बहुत भांति तिन्ह आंख दिखाए’ और क्रोधांध हो ‘सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहस्रबाहु सम सो रिपु मोरा’ तक कह डाला। तदुपरांत अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए ‘अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामंदिर दोउ भ्राता’ कहा और तपस्या के निमित्त वन को लौट गए। रामचरित मानस की ये पंक्तियां साक्षी हैं-‘कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गए वनहिं तप हेतू’...

-गतांक से आगे...

दंत कथाएं

ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथानक मिलता है कि कैलाश स्थित भगवान शंकर के अंतःपुर में प्रवेश करते समय गणेश जी द्वारा रोके जाने पर परशुराम ने बलपूर्वक अंदर जाने की चेष्ठा की। तब गणपति ने उन्हें स्तम्भित कर अपनी सूंड में लपेटकर समस्त लोकों का भ्रमण कराते हुए गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन कराके भूतल पर पटक दिया। चेतनावस्था में आने पर कुपित परशुराम जी द्वारा किए गए फरसे के प्रहार से गणेश जी का एक दांत टूट गया, जिससे वे एकदंत कहलाए।

रामायण काल

उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुंच कर प्रथम तो स्वयं को ‘विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही’ बताते हुए ‘बहुत भांति तिन्ह आंख दिखाए’ और क्रोधांध हो ‘सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहस्रबाहु सम सो रिपु मोरा’ तक कह डाला। तदुपरांत अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए ‘अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामंदिर दोउ भ्राता’ कहा और तपस्या के निमित्त वन को लौट गए। रामचरित मानस की ये पंक्तियां साक्षी हैं-‘कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गए वनहिं तप हेतू’। वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनंदन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचंद्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया। जाते-जाते भी उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविंदों के प्रति सुदृढ़ भक्ति की ही याचना की थी।

महाभारत काल

भीष्म द्वारा स्वीकार न किए जाने के कारण अंबा प्रतिशोधवश सहायता मांगने के लिए परशुराम के पास आई। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिए ललकारा। उन दोनों के बीच 23 दिनों तक घमासान युद्ध चला। किंतु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरूप परशुराम उन्हें हरा न सके। परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुंचे। किंतु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे। तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणाचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिए कहा। तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र-शस्त्र उनके मंत्रों सहित चाहता हूं ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा सके। परशुरामजी ने कहा-‘एवमस्तु!’ अर्थात् ऐसा ही हो। इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गए।