Monday, August 19, 2019 04:06 PM

किसे और क्यों चुनें प्रतिनिधि

सुनील कुमार

स्वतंत्र लेखक

 

पूंजीपति अपने मुनाफे की हवस में लोगों को उनकी बसी-बसाई जगहों से उजाड़ते हैं। जल-जंगल-जमीन से ‘दिन दोगुनी, रात चौगुनी’ संपत्ति को बढ़ाते हैं और सांसद, विधायक इस लूट में सहयोग कर अपने निवेश किए हुए पैसों को अगले चुनाव तक कई-कई सौ गुना बढ़ाने में लगे रहते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान-मजदूर हैं, लेकिन उनकी स्थिति बदतर होती जा रही है। रोटी-कपड़ा-मकान, जो किसी भी देशवासी के मौलिक अधिकार हैं, उससे भी देश की बहुसंख्यक जनता वंचित है...

कुछ ही दिनों में भारत की 17वीं लोकसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। ऐसे में सहज सवाल उठता है कि उम्मीदवार चुनाव क्यों लड़ रहे हैं? वे अपने-अपने चुनाव अभियानों में क्यों भारी-भरकम रकम लगा रहे हैं? ‘सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’ के अनुसार 1996 के लोकसभा चुनाव में 2500 करोड़ रुपए खर्च हुए थे, जो 2009 और 2014 में बढ़कर क्रमशः 10,000 और 35,547 करोड़ रुपए हो गए थे। वर्ष 2019 के इन चुनावों में 50 हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है, जो कि अमरीकी चुनाव से भी कहीं अधिक है। जिस तरह उद्योगपति अपने उत्पादों को बेचने के लिए विज्ञापन कंपनियों का सहारा लेते हैं, ठीक उसी तरह चुनाव में जनता तक पहुंचने के लिए विभिन्न पार्टियां प्रचार एजेंसियों की सहायता ले रही हैं। प्रचार कंपनियों के माध्यम से 2009 से इलेक्ट्रानिक चुनाव प्रचार पर बहुत धन खर्च किया जा रहा है। चुनाव में काले धन का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। इससे यह माना जाता है कि चुनाव के बहाने ही पर्चा, पोस्टर, बैनर, झंडे, बैज बनाने वाले छोटे कारोबारियों, पेंटरों इत्यादि की जेब में भी पैसे आ जाते हैं और अर्थव्यवस्था में थोड़ा सुधार होता है, लेकिन जिस तरह से यह चुनाव अब इलेक्ट्रानिक माध्यमों और सोशल साइटों के जरिए लड़ा जा रहा है, उससे यह पैसा भी कुछ मीडिया घरानों की जेब में ही जाता है।

पांच साल में भाजपा सरकार विज्ञापन पर करीब 5,000 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। चुनाव के दौरान और भी ज्यादा रकम खर्च कर अपनी पांच साल की उपलब्धियों और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ व अंतरिक्ष में ताकतवर बनने के सपने बेच कर वह दोबारा सत्ता में लौटना चाह रही है। कांग्रेस पार्टी यूनिवर्सल आय (6,000 रुपए प्रतिमाह) के सपने लोगों को दिखा रही है। क्षेत्रीय पार्टियां जाति और अस्मिता के सवाल पर चुनाव जीतना चाहती हैं। राष्ट्रीय या क्षेत्रीय, कोई भी पार्टी रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं की स्वतंत्रता, सुरक्षा या साम्राज्यवाद-पूंजीवाद परस्त नीतियों पर अपना मुंह नहीं खोल रही है, जिसके कारण बेरोजगारों की फौज खड़ी हो रही है और मेहनतकश आत्महत्या करने पर विवश हो रहे हैं। उपग्रह-रोधी मिसाइल का परीक्षण कर भारत को महाशक्ति बनाने का दुःस्वप्न दिखाना वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा है। भुखमरी के ‘वर्ल्ड हंगर इंडेक्स’ (विश्व भूख सूचकांक) में भारत, पड़ोसी नेपाल और बांग्लादेश से भी पीछे, 103वें स्थान पर चला गया है, जबकि 2014 में वह 55वें स्थान पर था। हम पड़ोसी देश में एयर स्ट्राइक की बात कर रहे हैं, लेकिन ‘विश्व खुशहाली सूचकांक’ में पाकिस्तान, बांग्लादेश से भी नीचे 133वें स्थान पर हैं। सरकार जहां पकौड़ा बेचने को भी रोजगार मान रही है, वहीं बेरोजगारी की दर सर्वाधिक आठ प्रतिशत से अधिक पहुंच गई है, जिसके चलते सरकार ने बेरोजगारी के आंकड़े ही सार्वजनिक करना बंद कर दिया है। वर्ष 2014 में किसानों से किए गए वादों को सरकार पूरा नहीं कर पाई, तो किसानों को पार्लियामेंट पर नग्न प्रदर्शन करना पड़ा, जो कि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए शर्म की बात है। एक तरफ दलितों, अल्पंसख्यकों पर अत्याचार बढ़े हैं, तो दूसरी तरफ आदिवासियों की जमीन छीनकर पूंजीपतियों को दी जा रही है। लूट की इसी कमाई का दो-चार प्रतिशत खर्च कर पूंजीपति अपने मन-मुताबिक सरकार का गठन करते हैं। चुनाव के नाम पर कुछ धनबली-बाहुबली, गुंडों-माफिया, बलात्कारियों को पैसा लेकर पार्टियां जनता पर थोप देती हैं और उन्हीं में से कुछ संसद में जाते हैं। यही कारण है कि पंद्रहवीं लोकसभा में 300 सांसद करोड़पति-अरबपति थे, तो 16वीं लोकसभा में इनकी संख्या 442 हो गई थी। 15वीं लोकसभा में 150 आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसद संसद में पहुंचे थे, तो 16वीं लोकसभा में 179 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें से 114 पर संगीन अपराधों के मुकदमे थे। सभी पार्टियों को कारपोरेट जगत रिश्वत की एवज में चुनावी चंदा देते हैं। नतीजे में सरकार उसी पार्टी की बनती है, जो पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की अच्छी-से-अच्छी सेवा कर सके। इसके बाद कारपोरेट जगत पार्टियों को दिए गए चंदे को सूद समेत कई गुना वसूल करता है। मुकेश अंबानी की कमाई प्रतिदिन 300 करोड़ रुपए है और उसने 2018 में बिलगेट्स, वारेन बफे और लैरी पेज जैसे वैश्विक पूंजीपतियों को पीछे छोड़ दिया था। इसी तरह गौतम अदानी की संपत्ति जनवरी 2017 से दिसंबर 2017 तक दोगुने से अधिक (125 प्रतिशत) हो गई। दूसरी तरफ किसानों को अपनी फसलों का लागत मूल्य निकालने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जिसको हम बहुमत की सरकार कहते हैं, वह आमतौर पर सिर्फ 12-15 फीसदी अधिक वोट पाकर ही बनती है। खुद को सर्वशक्तिमान मानने वाली मौजूदा केंद्र सरकार भी कुल जमा 31 फीसदी वोट पाकर ही अस्तित्व में आई थी।

यह क्रम 1951 से ही चला आ रहा है, लेकिन आज तक यह लोकतंत्र हमें पीने का मामूली साफ पानी तक मुहैया नहीं करा पाया है, शिक्षा-स्वास्थ्य तो दूर की बात है। आजादी के बाद से देश में प्रायः सभी दलों की सरकारें बनीं। यहां तक कि देश और प्रदेशों में अलग-अलग क्षेत्रीय सरकारें भी बनीं, लेकिन आज तक जनता की समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ती ही गई हैं। आमतौर पर ‘जन प्रतिनिधि’ संसद, विधानसभाओं में जाकर अपने चुनाव में निवेश की हुई रकम सूद समेत वसूलने में व्यस्त रहते हैं। देशी-विदेशी पूंजीपतियों से पैसा लेकर सरकारें सहमति-पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर करती हैं और लोगों की जीविका के साधन जल-जंगल-जमीन को पूंजीपतियों के हवाले कर देती हैं। पूंजीपति अपने मुनाफे की हवस में लोगों को उनकी बसी-बसाई जगहों से उजाड़ते हैं। जल-जंगल-जमीन से ‘दिन दोगुनी, रात चौगुनी’ संपत्ति को बढ़ाते हैं और सांसद, विधायक इस लूट में सहयोग कर अपने निवेश किए हुए पैसों को अगले चुनाव तक कई-कई सौ गुना बढ़ाने में लगे रहते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान-मजदूर हैं, लेकिन उनकी स्थिति बदतर होती जा रही है। रोटी-कपड़ा-मकान, जो किसी भी देशवासी के मौलिक अधिकार हैं, उससे भी देश की बहुसंख्यक जनता वंचित है।

किसानों का अन्न बेचने वाली कारगिल, मेनसेंटों जैसी कंपनियां मालामाल होती जा रही हैं, लेकिन किसानों के अन्न की कीमत संसद में तय की जाती है, जबकि खेती में काम आने वाली खाद, कीटनाशक, दवाएं, ट्रैक्टर, पंपसेट इत्यादि बनाने वाली कंपनियां उनका मूल्य खुद निर्धारित करती हैं। सवाल है कि क्या लोकतंत्र में चुनाव की मार्फत ऐसे ही राजनीतिक दलों, समूहों को सत्ता सौंपी जाए या खुद नागरिक जिम्मेदारी को निभाते हुए अपने लिए ठीक प्रतिनिधि चुना जाए?