Monday, June 01, 2020 02:23 AM

कुदरत का चक्रवाती कहर

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस और सुपर चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ एक साथ दो-दो कहर आपदाएं और त्रासदियां। कोई कैसे झेल सकता है? तूफान भी कुदरत का एक निश्चित चक्र है। वह चक्र समीक्षा करता है, समंदर की सफाई करता है, लेकिन असंख्य लोगों को बर्बाद और विस्थापित भी करता है। बड़े-बड़े कालजयी से प्रतीत होने वाले पेड़ भी उखड़ कर जमींदोज हो जाते हैं। करीब 500 साल पुरानी इमारत का इतिहास भी मलबा हो गया। जो संसाधन इंसान की मेधा, मेहनत और शोध क्षमताओं ने स्थापित किए थे, उनके सिरे और संचार भी गायब हो गए। मोबाइल टावर तक उड़ गया। बिजली के सैकड़ों खंभे और ट्रांसफार्मर अंततः लड़खड़ा कर जमीन पर आ गिरे और निष्प्रभावी हो गए। यह आलेख लिखने तक आधा कोलकाता और ओडिशा के आधा दर्जन इलाकों में बिजली गुल थी। नियति या प्रकृति का यह कैसा न्याय है? ये महाकहरी तूफान भी सूर्य की गर्मी और समंदर के बढ़ते तापमान से गर्म हुए पानी और फिर वाष्पीकरण और तेज चक्रवाती हवाओं की एक रासायनिक प्रक्रिया का ही नतीजा होते हैं। मौसम विभाग ने ‘अम्फान’ को बीते 20 सालों के दौरान सबसे विनाशकारी तूफान आंका है, लेकिन ऐसी तबाही और बर्बादी बीते 100 सालों में भी बंगाल ने नहीं देखी थी। विनाश के कुछ साक्ष्य कोलकाता, हावड़ा ब्रिज, एयरपोर्ट, उत्तर और दक्षिण 24 परगना आदि में देखे जा सकते हैं और यही कहर के शिलालेख भी हैं। बहरहाल तूफान शांत हो चुका है और बांग्लादेश के बाद खाड़ी बंगाल में समाहित हो जाएगा। लिहाजा खबर यहीं तक सिमट कर रह सकती है। ऐसा महारौद्र और तांडवी रूप महज एक खबर नहीं हो सकता। यहां से तो इतिहासों का जन्म हो सकता है। जो विनाश हुआ है, उसकी कटाई-सफाई करने के बाद सड़कें चलने लगीं या बिजली बहाल हो गई अथवा वाहन मलबा उठाने लगे, घटनाक्रम इतना ही नहीं है। हम 21वीं सदी के कालखंड में बसे हैं। दरअसल ‘अम्फान’ की जानलेवा गति और तांडवी उफान के मद्देनजर पश्चिम बंगाल और ओडिशा में जिन 6.58 लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया था, वे घर और लाखों लोग विस्थापित हुए थे। विस्थापन का यह दंश और त्रासदी उनके जीवन का एक तय हिस्सा बन गया है। न जाने कितनी बार वे विस्थापित हो चुके हैं और न जाने कब अगला तूफान उन्हें उजाड़ कर बिखेर देगा। 21वीं सदी में भी ऐसा इंसानी जीवन...! फिलहाल आंकड़ा यह बताया गया है कि 5500 से अधिक घर तबाह हुए हैं। अंतिम आंकड़ा मिलने में अभी वक्त लगेगा क्योंकि वह अंतिम निर्णय गृह मंत्रालय के स्तर पर होता है। लेकिन बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने एक लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा के नुकसान का आकलन किया है। वहां चक्रवाती तूफान 80 जिंदगियां लील गया, वैसे ममता ने पहले 72 के मरने की सूचना दी थी, लिहाजा ये आंकड़े बदलते रहेंगे। ओडिशा में भी छह जीवन नष्ट हुए हैं। तूफान ने बंगाल को ज्यादा हताहत किया है, लेकिन ऐसे जलजले तटीय इलाकों में तांडव मचाते रहे हैं। इस बार त्रासदियां इतनी घनेरी थीं कि खुद प्रधानमंत्री मोदी को 83 दिनों के बाद कोरोना का मोर्चा छोड़कर दिल्ली से बाहर जाना पड़ा है। वह पहले कोलकाता पहुंचे और बाद में भुवनेश्वर गए। दोनों जगह राज्यपाल और मुख्यमंत्रियों के साथ तूफान से प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण किया। बाद में शीर्ष अधिकारियों की उपस्थिति में समीक्षा बैठकें भी की। जाहिर है कि आपदा और त्रासदी की इस घड़ी में आर्थिक पैकेज भी दिए जाएंगे। हालांकि आलेख लिखे जाने तक प्रधानमंत्री ने घोषणा नहीं की थी, लेकिन यह संघीय ढांचे की औपचारिकता भर है। लेकिन जब भी आपदाकाल आता है, तो एक काटने वाला और सवालिया सच सामने आ खड़ा होता है कि देश की 73 साल की आजादी में करीब 50 करोड़ की आबादी गरीब या गरीबी-रेखा के नीचे क्यों गुजर-बसर कर रही है? आज भी करोड़ों भारतीय झुग्गी-झोंपडि़यों या कच्चे मकानों में रहने को अभिशप्त क्यों हैं? बार-बार लाखों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर क्यों भेजा जाता है? वे हमेशा ही सुरक्षित क्यों नहीं हैं? बेशक तूफान, सुनामी आदि कुदरती चक्रों को कोई विकसित देश भी रोक नहीं पाया, लेकिन उसके समानांतर बंदोबस्त तो किए जाने चाहिए। यह यथार्थ भी एक किस्म की त्रासदी है।