Tuesday, June 02, 2020 11:57 AM

कुरसी सिर पर चढ़ गई रे…

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

सुबह की सैर के दौरान रामदीन बड़े ़खुश नज़र आ रहे थे। उन्हें नई-नई थानेदारी जो मिली थी। उन्हें लग रहा था कि अब वह जिसे चाहे हड़का सकते हैं। कुछ विरोधी तो पड़ोस में ही हैं। लगे हाथ उन रिश्तेदारों को भी, जिनसे वह बरसों से ़खार खाए बैठे थे। माल बनाने का भी सबसे बेहतर यही मौ़का है। माल तो उन्होंने पहले भी ़खूब बनाया था। लेकिन अभी सात पुश्तों के लिए नहीं जोड़ पाए थे। बस उन्हें यही चिंता बनी रहती थी कि उनके बाद उनकी रामप्यारी, बच्चों और उनके बच्चों का क्या होगा। पंडित जॉन अली मिले तो कहने लगे, ‘‘पंडित जी, अब तो सिर कढ़ाई और उंगलियां घी में हैं। सदर की थानेदारी मिलना बच्चों का खेल नहीं। जब देखो थाने में भक्तों की रेलम-पेल रहती है। ऊपर का हिस्सा भिजवाने के बाद भी गल्ले में उससे ज़्यादा बच जाता है। बड़ी बऱकत है, वहां की कुरसी में। थानेदारी मिले तो ऐसी।’’अनुभव से स़फेद हुए बालों पर हाथ फेरते हुए पंडित जी बोले, ‘‘चढ़ गई रे, चढ़ गई मैंनू कुरसी दी सौं चढ़ गई।’’ मैंने पंडित जी के हाथ पर हाथ मारा तो मेरा संकेत समझ कर चुप हो गए। रामदीन उन्हें तमतमाई नज़रों से देख रहे थे। उन्हें पंडित जी के ताने की किरचियां चुभने लगी थीं। कुछ दिनों बाद उन्होंने पंडित जी को नाके पर धर लिया। बिना पूछे हाथ में चालान थमाते हुए बोले, ‘‘पंडित जी, सिर पर हेलमेट तो चढ़ा लेते। यहां कुरसी की ज़रूरत नहीं थी।’’ मौ़के पर ही चालान भुगतने के बाद पंडित जी बोले, ‘‘रामदीन जी, चढ़ गई रे चढ़ गई। अब साबित भी होने  लगा है।’’ रामदीन कसमसा कर रह गए। पंडित जी ़कलमघसीटू थे। उन्हें लगा कि पंडित इस बात का बदला कहीं ़कलम घसीट कर न निकालें। तुरंत जेब से चालान के पैसे वापस निकाल कर देते हुए बोले, ‘‘अरे! आप तो बुरा मान गए। मैं तो बस आपको याद दिलाना चाहता था कि आप हेलमेट के बिना न चलें। आपकी सुरक्षा हमारी ज़िम्मेवारी है।’’ पंडित जी निर्लिप्त भाव से हंसते हुए बोले, ‘‘क्या हुआ रामदीन जी, कुरसी मिलते ही आपकी नज़रें भी कमज़ोर हो गईं? हेलमेट तो सिर पर ही था। आपको दिखा नहीं। ़खैर, चालान तो आपने काट ही दिया। आपने पैसे जेब में रखे होते तो ज़रूर एतराज़ करता।’’कुछ दिनों बाद रामदीन रिश्वत के आरोप में लाइन हाज़िर कर दिए गए। एक बार फिर सुबह की सैर में पार्क में जुटे तो पंडित जी बोले, ‘‘रामदीन जी, कैसे मिज़ाज हैं आपके? कुरसी ठीक-ठाक है?’’रामदीन झेंपते हुए बोले, ‘‘पंडित जी, आपका ही शाप लगा। मैं तो ़खूब कमा रहा था। आपके चालान के ह़फ्ते भर में ही निपट गया। जो कुरसी के लिए दिए थे, उसका दस ़फीसदी भी वसूल नहीं हुआ।’’पंडित जी गंभीर स्वर में बोले, ‘‘आपने वह कहावत तो सुनी होगी कि अम्मा जब थानेदारी मिलेगी तो पहला डंडा आपका। बेहतर हो हम किसी भी तरह की कुरसी सिर पर न चढ़ने दें। वैसे भी समय का शिखर नुकीला है। वहां ज़्यादा देर नहीं टिक पाते। गोल-गोल ग्लोग में सब गोल-गोल घूमते रहते हैं। जो समय खुद को समझने का होता है, उसे कुरसी मिलने पर दूसरों को सबक सिखाने में बरबाद कर देते हैं। नतीजा, कुरसी सिर से उतरने के बाद हम अकेले रह जाते हैं। अपनी अंतरात्मा भी साथ छोड़ जाती है।’’