Tuesday, September 17, 2019 04:00 PM

कुर्सी पर या कुर्सी सिर पर

अजय पाराशर

स्वतंत्र लेखक

अभी कुछ दिन पहले की बात है। मुंगेरी लाल कुर्सी पर बैठने के लिए मरे जा रहे थे। साम, दाम, दंड, भेद के अलावा जो भी कर सकते थे, कर रहे थे। बकध्यानी होकर पार्टी से टिकट हासिल करने की जुगत भिड़ा रहे थे। करीब-करीब कामयाब हो भी गए थे। यह तो बुरा हो नत्थू लाल का, जो उनसे एक करोड़ अधिक देकर राजधानी से अपना टिकट कटा कर, उनका टिकट साफ कर आए। जब उन्होंने अपने दलबल सहित पार्टी प्रमुख से इसकी शिकायत की तो उन्होंने दिलासा देते हुए कहा, कि भले ही नत्थू राम पर रेप का आरोप है, लेकिन उनके विधानसभा हलके के जातीय समीकरण उनके पक्ष में है। दूजे उनकी दबंगई और माली हालत उनसे ज्यादा मजबूत है। ऐसे में भला नत्थू मुंगेरी को इलेक्शन कैसे जीतने देंगे। जब मुंगेरी ने उनके द्वारा की गई पार्टी सेवा और अपने सामाजिक कार्याें का ब्यौरा देते हुए अध्यक्ष के सामने टेसु बहाना शुरू किए तो वह उनकी भक्ति देखकर पसीज उठे और बोले कोई बात नहीं, ‘‘अगर तुम्हें टिकट नहीं मिला तो क्या हुआ? पार्टी के दोबारा सत्ता में आने पर वह उन्हें किसी बोर्ड या निगम का चेयरमैन बनवा देंगे। ताकि अगले इलेक्शन तक तुम नत्थू से ज्यादा मजबूत हो जाओ। पर अध्यक्ष बनने पर जो नेक कमाई होगी, उसमें उनका भी ध्यान रखना होगा।’’ अपने आंसुओं पर काबू पाते हुए मुंगेरी ने उनके चरण छुए और नत्थू को इस शर्त पर चुनाव जिताने का प्रण कर आए कि जीतने पर उन्हें मंत्री पद नहीं दिया जाएगा और अनपढ़ होने के बावजूद उन्हें परिवहन निगम का चेयरमैन बनाया जाएगा। पार्टी के दोबारा सत्ता में लौटने के बाद तो मुंगेरी हसीन सपनों में खो गए। उन्हें लगने लगा कि चेयरमैनी अब मिली कि अब मिली, लेकिन जब साल भर बाद भी कुछ नहीं घटा तो वह पार्टी प्रमुख को उनका वायदा याद दिलाने राजधानी जा पहुंचे। जब उन्हें कुछ याद नहीं आया तो मुंगेरी को मजबूरन वह वीडियो दिखाना पड़ा, जिसमें प्रमुख एक समाज सेविका के साथ आपत्तिजनक अवस्था में नजर आ रहे थे। सकपका पार्टी प्रमुख ने उन्हें सुबह तक इंतजार करने को कहा। लेकिन देर शाम को ही मुंगेरी को अपनी नियुक्ति की खुशखबरी मिल गई। नए आसन पर विराजमान होने के बाद मुंगेरी लाल के पांव कुछ दिन तो जमीन पर टिके रहे। लेकिन एक दिन अचानक उनकी गर्दन ने दांए-बांए घूमने से इनकार करते हुए नब्बे डिग्री से कम पर झुकने से मना कर दिया। उनकी आंखें भी सामने टिकी रहने लगीं। हां, बस यह देखने भर के लिए कि किसने उन्हें नमस्ते की है और कौन आदमी काम का है, थोड़ा-बहुत घूम जाती हैं। धीरे-धीरे मुंगेरी ने कुर्सी को सिर पर उठा लिया है और अब वह जहां भी जाते हैं, कुर्सी उनके सिर पर नजर आती है।