Wednesday, July 17, 2019 07:50 AM

कुल्लू के मलाणा में आज भी देवता का शासन चलता है…

कुल्लू में मलाणा नामक स्थान है, जहां अभी भी देवता का ही शासन चलता है और इस देवता का नाम जामलू देवता है। जामलू देवता के बारे में कई लोक गाथाएं प्रचलित हैं और मलाणा निवासियों के बारे में भी कई तरह के विचार प्रचलित हैं ...

गतांक से आगे ...

जामलू पूजा (मलाणा कुल्लू) ः कुल्लू में मलाणा नामक स्थान है, जहां अभी भी देवता का ही शासन चलता है और इस देवता का नाम जामलू देवता है। जामलू देवता के बारे में कई लोक गाथाएं प्रचलित हैं और मलाणा निवासियों के बारे में भी। कई तरह के विचार प्रचलित हैं कि जब सिकंदर महान (326 ई. पू.) ब्यास नदी के किनारे से वापस लौटा तो उसके छह यूनानी सैनिक वापस जाने की बजाय सुरक्षित स्थान मलाणा में बस गए और मलाणा निवासी उनकी संतान हैं। कई लोग जामलू देवता को जमदग्नि ऋषि का रूप मानते हैं। मलाणा निवासियांे को कई किन्नरों की संतान भी मानते हैं।

लोक गाथा प्रचलित है कि एक साधु मलाणा के जामलू देवता के कोष से पैसे ले गया और दिल्ली चला गया। अकबर बादशाह के कर्मचारियों ने दो पैसे चुंगी के रूप में साधु से जबरदस्ती ले लिए। जब ये पैसे अकबर के खजाने में पहुंचे तो उसे कुष्ठ हो गया। ज्योतिषियों  ने कुष्ठ का कारण वे दो पैसे बताए जो खजाने मंे इकट्ठे जुड़े हुए मिल गए। अकबर को सलाह दी गई कि वह सोने-चांदी सहित उन दो पैसों को जामलू के खजाने में मलाणा भिजवाए। अकबर ने आदमी भेज कर ऐसा ही किया और ठीक हो गया। इस घटना की समृति में हर वर्ष फागुण मास मंे वहां मेला लगता है।

डूम देवता की पूजा (शिमला क्षेत्र) ः डूम (या नगर कोटियां) भी हिमाचल के मध्य भाग का एक प्रसिद्ध देवता है, जिसका मुख्य मंदिर फागु (ठियोग तहसील) के कारयाणा गांव में है। किसी समय यह देवता कुठाड़, महलोग, बुशैहर, कोटखाई, जुब्बल, बाधल, कोटी व अन्य रियासतों में यात्रा करता था और 11वीं शताब्दी में इस देवता ने पंवार राजपूतों के समय दिल्ली की यात्रा भी की थी। इस डूम देवता के बारे लोक गाथा प्रचलित है कि खलनिध नामक कुनैत के हाटकोठी की कृपा से असीम शक्ति से भरपूर दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनकी मृत्यु के बाद उनके ‘पाप’ या ‘खोट’ ने लोगों को तंग कर दिया। अतः लोगों ने उनकी डूम देवता के नाम से पूजा आरंभ कर दी। उसका तंग करने का तरीका था लोगों की भैसों और गऊओं  के घी या दूध को सुखा देना। अतः गाय या भैंस के सूने (बच्चा देने) पर दूध और घी पहले इस देवता को चढ़ाना पड़ता है।

जख या पीर ः निम्न शिवालिक भागों मंे भी इस प्रकार के देवता हैं और उनके मंदिर बने हैं, जिन्हें जख या पीर कहा जाता है। जख या पीर की मूर्तियां न होकर मंदिर के अंदर उनकी कब्र बनी होती है। ये पशुओं की बीमारियों से विशेष रूप से रक्षा करते हैं। भैंस या गाय सूने पर जो सबसे पहले घी निकलता है, इनके मंदिरों मंे चढ़ाया जाता है। प्रमुख पीर बिलासपुर मंे पीरभ्याणु, ऊना मंे पीरगाह व पीरसलूही आदि हैं।