Saturday, November 27, 2021 11:27 PM

कृषि हेल्पलाइन

सफेद मक्खी से बचाव को हर बार बदलें दवा

सफेद मक्खी, जिसको पोलीहाउस मक्खी के नाम से भी जाना जाता  में इंग्लैंड में टमाटर व खीरे के उन फलों को बेचने की मनाही थी, जिन पर इस मक्खी के होने का संदेह होता था। हमारे देश में भी इस मक्खी का आक्रमण अनेक सब्जियों पर देखा गया है और ऐसे पौधों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। हमारे प्रदेश में आज से 10-15 साल पहले इस मक्खी को यद्यपि पौधों पर कहीं-कहीं देखा गया था, लेकिन नुकसान बहुत अधिक नहीं था, पर अब यह मक्खी लगभग सभी प्रकार की सब्जियों की फसलों पर देखा जा सकती है।

हमारे देश में यह मक्खी सबसे पहले दक्षिण भारत में नीलगिरि पहाडि़यों के कोटगिरी में आलू में पाई गई थी। बाद में यह सोयाबीन व टमाटर के पौधों को ग्रसित करती हुई पाई गई, लेकिन अब यह कई प्रकार की सब्जियों की फसलों में पाई जाती है। यह मक्खी बहुत छोटे आकार की होती है, जिसके दोनों पंख सफेद होते हैं। यह पत्ते के नीचे छिपी हुई होती है, जहां यह पत्ते के उत्तक में एक या दो झुंड में अंडे देती है। इसके शिशु व प्रौढ़ दोनों पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। ये पत्तों से रस चूसते हैं, जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं तथा बाद में सूख जाते हैं। इसके अतिरिक्त यह शहद रूपी पदार्थ भी छोड़ती है। मुख्य नुकसान पौधों को इसी के द्वारा होता है। यह शहद पत्तों तथा पौधों के अन्य भागों में फैलता है। इसी शहद पर काली फफूंद पैदा हो जाती है, जिससे पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया कम हो जाती है और पौधों की सांस लेने की प्रक्रिया कम हो जाती है। पोलीहाउस या ग्लासहाउस में उगाई जाने वाली सब्जियों में सफेद मक्खी एक मुख्य नाशीकीट है।

जीवनचक्र : मादा मक्खी पत्ते के नीचे अंडे देती है जो हल्के पीले रंग व नाशपाती के आकार के होते हैं। इन अंडों का रंग 24 घंटों में गहरे भूरे रंग का हो जाता है। इन अंडों से गर्मियों में तीन-पांच दिनों के अंदर शिशु निकल आते हैं। एक मादा अपने जीवनकाल में 45-175 तक अंडे देती है।

नियंत्रण : सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए एक ही कीटनाशी रसायन का प्रयोग नहीं करना चाहिए अन्यथा यह कीट उस रसायन के प्रति प्रतिरोध पैदा कर लेता है। इसके नियंत्रण के लिए अलग-अलग कीटनाशी रसायनों का प्रयोग बहुत ही उपयोगी पाया गया है। मुख्य कीटनाशी रसायन जैसे आक्सी डेमेटॉन मिथाइल (0.025 प्रतिशत) या ईमीडाक्लोपरिड (0.025 प्रतिशत) या ऐसीटामापरिड (0.01 प्रतिशत) का छिड़काव दस दिनों के अंतराल में करना उपयोगी पाया गया है।

डा. अजय शर्मा

सौजन्यः डा. राकेश गुप्ता, छात्र कल्याण अधिकारी, डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय,सोलन

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