Tuesday, November 30, 2021 07:33 AM

कृषि हेल्पलाइन

वूली एफिड से समय पर बचाएं सेब

इस साल वर्षा कम होने की वजह से सेब के बागीचों में रुएंदार तेला (वूली एफिड) कीट का आक्रमण देखा जा रहा है। यह कीट सेब तुड़ान के उपरांत अकसर आक्रमण करता है। बागबान इसकी पहचान बहुत आसानी से कर सकते हैं। यह बागीचों में वृक्षों पर रुएंदार फाहे के रूप में नजर आता है, जिसके भीतर छोटे-छोटे रस चूसने वाले कीट (एफिड) छिपे होते हैं। यह रुएंदार पदार्थ एक तरह से कीट की रक्षा परत के रूप में काम करता है।

इस कीट का आक्रमण अधिकतर नई शाखाओं तथा वृक्षों में जख्म वाले स्थानों पर अधिक दिखता है। इस कीट का आक्रमण वृक्ष के ऊपरी भागों के अतिरिक्त जड़ों पर भी होता है। इस कीट के रस चूसने की वजह से गांठें पड़ जाती हैं, जिससे वृक्ष अपना भोजन पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर पाते तथा वृक्ष की वृद्धि रुक जाती है। इस कीट के आक्रमण की वजह से पैदावार एवं गुणवत्ता भी प्रभावित हो जाती है। यह कीट पौधशाला में भी काफी नुकसान करता है।

वृक्ष के ऊपरी भाग में तो लक्षण आसानी से दिख जाते हैं, परंतु जड़ों में इनके लक्षण तौलिए की मिट्टी हटाकर ही देखे जा सकते हैं। फल तुड़ान के समय ये कीट फल तोड़ने वालों के हाथों एवं शरीर से टकराकर मर भी जाते हैं, परंतु यह बागीचों में फल तोड़ने वालों के लिए एक समस्या है।

कुछ मित्र कीट जैसे लेडी बर्ड बीटल, सिरफिड मक्खी एवं परजीवी (एफीलाइनस माली) प्राकृतिक रूप से कुछ हद तक इनका नियंत्रण रखते हैं। परजीवी मित्र कीट के इस नाशी कीट के आक्रमण से यह एफिड कीट रुईं रहित होकर सिकुड़ जाते हैं। इन लगभग मृत नाशी कीटों के शरीर से परजीवी व्यस्क निकल कर नए एफिड झुंडों पर आक्रमण करते हैं। जड़ों पर इन मित्र कीटों का एफिड झुंडों पर आक्रमण नहीं होता। यदि पौधशाला में एफिड कीट ग्रस्त पौधे बागीचों में लगाए जाएं तो ये पौधे ठीक से पनप नहीं पाते तथा बागीचा स्वस्थ नहीं रह पाता, इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि इस कीट का प्रबंधन समय पर हो जाए।

नया बागीचा लगाते समय यह ध्यान रखें कि पौधे किसी पंजीकृत पौधशाला से ही खरीदें। पौधे सरकारी पौधशालाओं (जैसे विश्वविद्यालय या बागबानी विभाग) से भी लिए जा सकते हैं। वृक्ष के ऊपरी भाग में जहां पर जख्म हो, उन्हें फंफूद दवा के पेस्ट से भर दें, ताकि एफिड कीट वहां पर स्थापित न हो सके।

इसी प्रकार कुछ नई शाखाएं जो पेड़ के तने के पास से निकलती हैं (वाटर स्पराइट्स) उन्हें नष्ट कर दें, क्योंकि इन शाखाओं पर भी इस कीट को फैलने का मौका मिल जाता है। वृक्ष के ऊपरी भागों में प्रबंधन हेतु क्लोरपायरिफॉस (डरमैट / ट्राइसेल / नैविगेटर / मॉसवान 20 ई. सी.) का 20 मिलीलीटर दवा प्रति 10 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।

जड़ों में नियंत्रण हेतु उपरोक्त दवा का पौधशाला में 30 मिलीलीटर/ 10 लीटर पानी तथा बड़े वृक्षों के तौलियों में 50 मिलीलीटर दवा / 10 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर सिंचित करें। यदि नया बागीचा लगाना हो तो एफिड प्रतिरोधी मूल वृंत (रूट स्टाक) एमएम सीरीज का प्रयोग करें तथा इस पर व्यावसायिक किस्म को ग्राफ्ट करें। इस प्रकार वृक्ष जड़ों में एफिड आक्रमण से बच जाते हैं। हमारे बागबान किसी भी समीप के कृषि विज्ञान केंद्र, अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों अथवा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों एवं बागबानी विभाग के अधिकारियों से भी संपर्क कर सकते हैं।

डा. दिवेंद्र गुप्ता, डा. रणजीत भाटिया

सौजन्यः डा. राकेश गुप्ता, छात्र कल्याण अधिकारी, डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय,सोलन

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