Tuesday, March 31, 2020 07:56 PM

केजरीवाल का ‘दीवाना’ विपक्ष

हालांकि केजरीवाल ने ऐसा कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है, लेकिन ‘आप’ के भीतर महत्वाकांक्षाओं के संकेत जरूर मिलने लगे हैं कि अब पार्टी का राष्ट्रीय विस्तार होना चाहिए। इस संदर्भ में पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह का बयान गौरतलब है। ‘आप’ ने राष्ट्र-निर्माण की तभी बात शुरू कर दी थी, जब दिल्ली चुनाव के पूरे नतीजे भी नहीं आए थे। मिस्ड कॉल के लिए जो फोन नंबर दिया गया था, उस पर 11 लाख से ज्यादा कॉल दर्ज हो चुकी हैं। यही नहीं, दूसरे नेता भी केजरीवाल मॉडल की सराहना करने लगे हैं। ‘आप’ विधानसभा चुनाव में 70 सीटों में से 62 सीटें जीत कर सरकार बनाने जा रही है, लेकिन इतनी सफलता से ही शरद पवार, ममता बनर्जी, अखिलेश और तेजस्वी यादव आदि विपक्षी नेताओं ने दमकना शुरू कर दिया है। विपक्ष का महागठबंधन बनेगा या वह बिखरा हुआ ही रहेगा, लेकिन यह बहस शुरू हो गई है कि क्या केजरीवाल विपक्ष का चेहरा हो सकते हैं? हालांकि राजनीतिक तौर पर केजरीवाल की हैसियत अन्य विपक्षी नेताओं की तुलना में फिलहाल बेहद सीमित है, फिर भी न जाने क्यों यह चर्चा शुरू हुई है? केजरीवाल का ‘काम की राजनीति’ वाला मॉडल भी कोई अप्रतिम और अभूतपूर्व मॉडल नहीं है। मौजूदा दौर में सबसे प्रमुख राजनीतिक मॉडल ओडिशा का है, जहां लगातार 5वीं बार नवीन पटनायक राज्य के मुख्यमंत्री चुने गए हैं। बिहार और बंगाल के मॉडल अपनी अलग किस्म के हैं। केरल में भूमि सुधार का मॉडल चर्चित रहा है। जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तो वहां का मॉडल देश भर में सर्वश्रेष्ठ मॉडलों में गिना जाता था। दक्षिण में तमिलनाडु का अपना राजनीतिक मॉडल रहा है, जहां आम आदमी और उसे मुफ्त बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना सरकारों और दलों का प्राथमिक एजेंडा रहा है। अपने दौर में बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु के राजनीतिक प्रयोग देश भर में मॉडल के रूप में ही मान्यता पाते थे। ‘काम की राजनीति’ कोई सर्वप्रथम प्रयोग नहीं है। गौरतलब यह भी है कि केजरीवाल की ‘आप’ ने दिल्ली के अलावा हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा आदि राज्यों में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव लड़े हैं। अधिकतर में हार हुई है या जमानतें जब्त हुई हैं। पंजाब में कुछ विधानसभा सीटें जरूर जीती थीं। केजरीवाल मॉडल दिल्ली में कामयाब या कारगर इसलिए रहा क्योंकि 5000 करोड़ रुपए का राजस्व अतिरिक्त था। बजट का कोई संकट नहीं था। यह मॉडल बिहार और बंगाल में सफल नहीं हो सकता, क्योंकि वे क्रमशः 40 और 42 लोकसभा सीट के राज्य हैं, जबकि दिल्ली से मात्र 7 सांसद ही चुनकर लोकसभा में जाते हैं। महाराष्ट्र से 48, तमिलनाडु से 39, कर्नाटक से 28, उत्तर प्रदेश से 80, मध्य प्रदेश से 29, राजस्थान से 25 सांसद चुनकर संसद में जाते हैं। इतने बड़े राज्यों की तुलना दिल्ली सरीखे अर्द्धराज्य से नहीं की जा सकती। लिहाजा विपक्ष की यह दीवानगी तार्किक नहीं कि केजरीवाल को कंधों पर बिठा लिया जाए। इसी साल बिहार में चुनाव हैं। यदि वहां राजद-कांग्रेस का गठबंधन जारी रहता है, तो विपक्ष की वहीं पहली परीक्षा हो जाएगी कि ‘आप’ को कितनी सीटें दी जाती हैं या केजरीवाल कितनी शिद्दत से प्रचार कर पाते हैं? सबसे प्रमुख राजनीतिक बाधा यह सामने आएगी कि कांग्रेस दिल्ली के बाहर केजरीवाल को कितना बड़ा नेता मानती है? बेशक कांग्रेस का पतन जारी है, लेकिन देश भर में भाजपा के बाद वह ही सबसे व्यापक पार्टी है। महाराष्ट्र में अपने नीतिगत एजेंडे से बाहर जाकर कांग्रेस उद्धव सरकार बनवाने में सहायक साबित हुई तो झारखंड में झामुमो के साथ उसका चुनाव-पूर्व का गठबंधन था। वहां भी वह सरकार में है। जब तक कांग्रेस का विस्तार ऐसा रहेगा तब तक वह ‘आप’ का नेतृत्व कैसे स्वीकार कर लेगी? और केजरीवाल विपक्ष का नेता कैसे बन पाएंगे? ये व्यावहारिक सवाल हैं, जिनका भावनाओं से कोई संबंध नहीं। बेशक दिल्ली जनादेश के लिए केजरीवाल और ‘आप’ बधाई के पात्र हैं, लेकिन उनका मॉडल राष्ट्रीय नहीं माना जा सकता। बेशक लगातार दूसरे चुनाव में बहुमत हासिल कर सरकार बनाने से इतना जरूर माना जा सकता है कि केजरीवाल ने खुद को एक क्षेत्रीय नेता के तौर पर स्थापित कर लिया है। बेशक राष्ट्रीय राजनीति पर उनकी और ‘आप’ की निगाहें लगी रहेंगी, लेकिन फिलहाल इससे ज्यादा कुछ और नहीं कहा जा सकता।