Wednesday, September 26, 2018 11:56 AM

कैसे कम होगी डालर की गुलामी

डा. वरिंदर भाटिया

लेखक, पूर्व कालेज प्रिंसीपल हैं

यानी हम इंपोर्ट ज्यादा करते हैं और एक्सपोर्ट बहुत कम। रुपए में गिरावट का एक बड़ा कारण डालर की बढ़ती डिमांड भी है। मसलन अगर कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो डालर की डिमांड स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। इसके अलावा एक कारण यह भी है कि भारत में इस समय निर्यात की तुलना में आयात ज्यादा हो रहा है। जब भी आप आयात करते हैं, आपको डालर ज्यादा खरीदना पड़ता है। जाहिर है ऐसे में करंसी मार्केट में डालर का प्रभाव बढ़ता है और रुपए में गिरावट आती है...

भारतीय रुपए को डालर नचा रहा है और इसमें गिरावट का सिलसिला जारी है। हाल ही में रुपया डालर के मुकाबले 21 पैसे टूट गया और अमरीकी डालर ने रुपए के मुकाबले रिकॉर्ड ऊंचाई (71.21) हासिल कर ली। इसके प्रभाव के चलते पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी नई ऊंचाई पर हैं। राजधानी दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 79.15 रुपए और मुंबई में 86.56 रुपए तक पहुंच गई है। वहीं दिल्ली में एक लीटर डीजल 71.15 रुपए और मुंबई में 75.54 रुपए की कीमत पर बिका। रुपए में गिरावट और पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमत के बीच अर्थशास्त्री महंगाई बढ़ने का अनुमान जाहिर कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल जायज है कि आखिर रुपया क्यों गिर रहा है? कुछ कारणों पर नजर डालें तो कच्चे तेल के दाम पहले ही छलांगें मार रहे थे, उस पर ट्रंप ने आग में घी डाला है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी रुपए के गिरने के पीछे एक बड़ी वजह है। पिछले कुछ समय से लगातार कच्चे तेल के दामों में तेजी आ रही है। हाल में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु समझौते तोड़ने का ऐलान कर डाला। इसके चलते कच्चे तेल के दाम करीब अढ़ाई फीसदी तक बढ़ गए। क्रूड ऑयल 77 डालर प्रति बैरल पहुंच गया। अमरीका से विशेषज्ञों की मानें, तो कच्चे तेल के दाम के अलावा अमरीकी अर्थव्यवस्था का भी रुपए की स्थिति पर गहरा असर पड़ता है। आने वाले समय में अमरीकी इकॉनमी अगर अच्छा करती है और वहां ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो भी रुपए पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। मतलब इसमें और अधिक गिरावट दर्ज की जा सकती है। रुपए और डालर के खेल को कुछ इस तरह समझा जा सकता है, मसलन अगर हम अमरीका के साथ कुछ कारोबार कर रहे हैं। अमरीका के पास 67,000 रुपए हैं और हमारे पास 1000 डालर,। डालर का भाव 67 रुपए है, तो दोनों के पास फिलहाल बराबर रकम है। अब अगर हमें अमरीका से भारत में कोई ऐसी चीज मंगानी है, जिसका भाव हमारी करेंसी के हिसाब से 6,700 रुपए है, तो हमें इसके लिए 100 डालर चुकाने होंगे। अब हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में बचे 900 डालर और अमरीका के पास हो गए 73,700 रुपए। इस हिसाब से अमरीका के विदेशी मुद्रा भंडार में भारत के जो 67,000 रुपए थे, वे तो हैं ही, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जो 100 डालर थे, वे भी उसके पास पहुंच गए। इस मामले में भारत की स्थिति तभी ठीक हो सकती है, अगर भारत अमरीका को 100 डालर का सामान बेचे, जो अभी नहीं हो रहा है। यानी हम इंपोर्ट ज्यादा करते हैं और एक्सपोर्ट बहुत कम। रुपए में गिरावट का एक बड़ा कारण डालर की बढ़ती डिमांड भी है। मसलन अगर कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो डालर की डिमांड स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। इसके अलावा एक कारण यह भी है कि भारत में इस समय निर्यात की तुलना में आयात ज्यादा हो रहा है। जब भी आप आयात करते हैं, आपको डालर ज्यादा खरीदना पड़ता है। जाहिर है ऐसे में करंसी मार्केट में डालर का प्रभाव बढ़ता है और रुपए में गिरावट आती है। एक जमाना था, जब अपना रुपया डालर को जबरदस्त टक्कर दिया करता था। जब भारत 1947 में आजाद हुआ, तो डालर और रुपए का दाम बराबर का था। मतलब एक डालर बराबर एक रुपया। तब देश पर कोई कर्ज भी नहीं था, फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई, तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपए की साख भी लगातार कम होने लगी। 1975 तक आते-आते तो एक डालर की कीमत 8 रुपए हो गई और 1985 में डालर का भाव 12 रुपए हो गया। 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा और अगले 10 साल में ही इसने 47-48 के भाव दिखा दिए। डालर के सामने अभी के माहौल में रुपए के नहीं टिक पाने की वजहें समय के हिसाब से बदलती रहती हैं। कभी यह आर्थिक हालात का शिकार बनता है, तो कभी सियासी हालात का और कभी दोनों का ही। पूरे देश में रुपए के गिरने से चिंता का वातावरण बन रहा है। इसका दुष्प्रभाव कम करने के लिए यदि हम स्वदेशी उत्पादों को अपनी प्राथमिकता बनाएं, तो रुपए को डालर की गुलामी कम हो सकती है। इस मामले में सरकारों और देशी उपभोक्ताओं को संजीदगी दिखानी होगी।