Tuesday, October 15, 2019 09:19 AM

कैसे होगी कांगे्रस की वापसी?

महाराष्ट्र कांग्रेस के एक अल्पसंख्यक नेता ने हमें बताया कि जब राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष थे, तो उन्होंने मुस्लिम कार्यकर्ताओं की एक अच्छी-खासी भीड़ के साथ उनसे मुलाकात का वक्त मांगा था। वह भीड़ कांग्रेस में शामिल होना चाहती थी। वे कई दिनों तक दिल्ली में डेरा डाले रहे, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष से मुलाकात नहीं हो सकी। नतीजतन निराश मन से वह और भीड़ मुंबई लौट गए। अब वह अल्पसंख्यक नेता, करीब 5000 कार्यकर्ताओं समेत, भाजपा में शामिल होने की तैयारी में हैं। भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा से उनकी मुलाकात हो चुकी है। महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे राधाकृष्ण विखे पाटिल से पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री नारायण राणे और मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष रहे कृपाशंकर सिंह तक तीसियों नेता कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आ चुके हैं अथवा शामिल होने वाले हैं। महाराष्ट्र में आगामी दो माह के दौरान विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। दिल्ली में कांग्रेस के ही एक पुराने दिग्गज नेता की इच्छा भी भाजपा में आने की है। उनके संपर्क में 12-15 पूर्व कांग्रेस विधायक भी हैं। जाहिर है कि उनके अपने-अपने जनाधार होंगे और आगामी छह माह के अंतराल में दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस नेतृत्वहीन अवस्था में है। युवा कांग्रेस के कुछ नए सियासी चेहरे भी भाजपा में अपने संपर्कों की गहराई नाप रहे हैं। जाहिर है कि वे भी मुंडेर पर बैठे कांग्रेसी हैं। हरियाणा का मामला भी कुछ ऐसा है। कांग्रेस आलाकमान को मजबूरन भूपेंद्र सिंह हुड्डा को ‘नेता’ बनाना पड़ा। पूरे कार्यकाल में किरण चौधरी विधायक दल की नेता बनी रहीं, लेकिन ऐन चुनाव से पहले यह रुतबा हुड्डा को देना पड़ा और उन्हीं के बाध्य करने पर कुमारी शैलजा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तय किया गया। पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र अभी सार्वजनिक होना है, लेकिन हुड्डा का दावा है कि बीते दिनों उन्होंने रोहतक रैली में जो वादे किए थे, वही घोषणा पत्र भी है। यदि कांग्रेस की सरकार बनी, तो उन्हीं के आधार पर काम किया जाएगा। चुनाव से दो महीने पहले कांग्रेस के भीतर का यह बदलाव कितना कारगर साबित होगा, चुनाव से पहले ही उसके रंग दिखने शुरू हो जाएंगे। दरअसल कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जो बैठक बुलाई थी, उसके समापन के बाद इन कांग्रेसियों का एक ही सवाल था-ऐसे कैसे कांग्रेस का उत्थान और वापसी संभव है? हालांकि बाहर आकर कांग्रेसी मानते रहे कि सोनिया के नेतृत्व में बैठक के दौरान चर्चाएं व्यापक हुईं, लेकिन सुझाव और रणनीति सभी पुरानी शैली के थे। बैठक करीब चार घंटे चली। पांच कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष तथा अन्य राज्यों के विधायक दल के नेताओं, पार्टी महासचिवों आदि ने बैठक में शिरकत की। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व रक्षा मंत्री एंटनी और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे। सोनिया गांधी का फोकस रहा कि सरकार और पार्टी के बीच समन्वय समितियां बनाई जाएं। राज्यों में मंत्री बारी-बारी से कांग्रेस कार्यालय में जाकर बैठें। बूथ स्तर के संगठन से लेकर सरकार तक एक ताकतवर और समन्वय वाला नेटवर्क स्थापित किया जाए। सवाल है कि कांग्रेस में ऐसे पाठ कब नहीं पढ़ाए गए? पार्टी में यही साफ  नहीं है कि सोनिया गांधी ही अध्यक्ष रहेंगी या कोई और नेतृत्व सामने आएगा? सोनिया की उम्र भी हो चुकी है और उन्हें बार-बार अस्वस्थ बताया जाता रहा है। सवाल है कि सबसे पहली चिंता पार्टी अध्यक्ष चुनने की होनी चाहिए या किसी और मुद्दे पर नसीहतें दी जाएं। संगठन की कवायद के साथ यह भी नसीहत दी गई है कि पार्टी आरएसएस और भाजपा से अलग दिखाई दे। अंतरिम अध्यक्ष के निर्देश हैं कि पूर्वोत्तर में पहले की तर्ज पर कांग्रेस समन्वय समितियां बनाई जाएं और वे पूर्वोत्तर के एनडीए के  समानांतर सक्रिय हों। विकास का एजेंडा भी अपना तैयार करें। वहां नागरिक संशोधन बिल का विरोध करें, लेकिन स्वदेशी और स्थानीय लोगों के लगातार संपर्क में रहें। सवाल है कि इस कवायद का नेतृत्व कौन करेगा? यह भी तय किया गया है कि पार्टी आर्थिक सुस्ती के विरोध में सड़क पर उतर कर संघर्ष करेगी। महात्मा गांधी की जयंती पर पैदल यात्राएं निकाली जाएंगी। उनके लिए पार्टी सचिवों को भी लामबंद किया जा रहा है। इसके नतीजे भी शीघ्र ही सामने होंगे। दरअसल कांग्रेस जिस अवस्था में है, उसके बावजूद आक्रामकता का उसमें अब भी अभाव है। संगठन और जन-प्रतिनिधि के स्तर पर पार्टी छिन्न-भिन्न होती जा रही है। देश के 16 राज्य ऐसे हैं, जहां उसका एक भी सांसद नहीं चुना गया है। सिर्फ  पांच राज्यों पंजाब, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और पुडुचेरी में कांग्रेस सरकारें बची हैं। उनमें से भी कितनी अपना कार्यकाल पूरा कर सकेंगी, यह भी एक अनिश्चित सवाल है। कांग्रेस के पास ऐसे विचार का भी अभाव है, जिससे आम आदमी जुड़ सके और संघर्ष को व्यापक बनाए। बहरहाल कांग्रेस छटपटाहट की स्थिति में मंत्रणा कर रही है, यह भी कोई कम नहीं है, लेकिन उसके फलितार्थ देखे जाने चाहिए।