Sunday, July 12, 2020 01:57 PM

कोरोना काल में राष्ट्रपति शासन

महाराष्ट्रकोरोना वायरस से सबसे ज्यादा त्रस्त राज्य है। वहां संक्रमण का सिलसिला टूट ही नहीं रहा है, नतीजतन संक्रमित लोगों की संख्या 55,000 को छूने लगी है। महामारी के देशव्यापी मरीजों में महाराष्ट्र की भागीदारी 36 फीसदी से ज्यादा है, लिहाजा देश के समीकरण ही बिगड़ रहे हैं। वैश्विक महामारी के ऐसे वीभत्स दौर में राजनीति नहीं होनी चाहिए, बल्कि समूचा देश ‘टीम इंडिया’ के तौर पर संक्रमण से लड़े। एशिया की सबसे बड़ी और घनी झुग्गी बस्ती-धारावी-मुंबई और महाराष्ट्र का एक भयानक सच है और काला कलंक भी…! वहां आबादी का घनत्व इतना है और औसतन 15-20 परिवार मात्र दो शौचालय ही इस्तेमाल करने को विवश हैं, तो कोरोना की चुनौती से कैसे लड़ा जा सकता है? यह भी यथार्थ का एक पक्ष है कि हर रोज औसतन 2000 नए संक्रमित मामले जुड़ जाते हैं और मौत का आंकड़ा भी 1000 को पार कर चुका है। ऐसे महाराष्ट्र में भाजपा सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। राज्यपाल से एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और उनके सहयोगी नेता प्रफुल्ल पटेल ने भी मुलाकात की। पवार मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के मूल निवास ‘मातोश्री’ भी गए और करीब डेढ़ घंटा चर्चा जारी रही। मुख्यमंत्री को अपने आधिकारिक आवास ‘वर्षा’ में भी बुधवार को गठबंधन के सहयोगी दलों की बैठक बुलानी पड़ी। कांग्रेस खुद को घटक दल के बजाय समर्थक दल मान रही है, जिसकी अहम निर्णयों में भागीदारी नहीं होती। क्या कांग्रेस उद्धव सरकार में शामिल नहीं है? बहरहाल माना जा सकता है कि विमर्श कोरोना वायरस से उपजी चिंतित स्थितियों पर हुआ हो, लेकिन जो शरद पवार की सियासत को जानते हैं, उन्हें पता है कि वह कभी भी, किसी को भी, गच्चा दे सकते हैं। उनका राजनीतिक इतिहास ऐसी ही घटनाओं से लबालब है। हालांकि शिवसेना और एनसीपी ने मजबूत गठबंधन और स्थिर सरकार का साझा आश्वासन सार्वजनिक रूप से दिया है। तो फिर मुंबई में सियासी हलचलें इतनी तेज क्यों हैं? सवाल यह भी वाजिब है कि भाजपा की ओर से राष्ट्रपति शासन की मांग एक नेता तक ही सीमित है अथवा पूरी पार्टी का ही अभियान है? क्या ‘ऑपरेशन कोरोनाÓ से ज्यादा महत्त्वपूर्ण ‘ऑपरेशन कमल’ है? केंद्रीय शासन के लिए सिर्फ मांग ही पर्याप्त नहीं है। गठबंधन टूट जाए और सरकार अल्पमत में आ जाए या कोई संवैधानिक संकट पैदा हो जाए अथवा राष्ट्र की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए कोई खतरा हो, ऐसी ही परिस्थितियों में राज्यपाल केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर सकते हैं, लेकिन उसकी भी एक निश्चित प्रक्रिया होनी चाहिए। सर्वोच्च  न्यायालय इस संदर्भ में कई बार स्पष्ट कर चुका है। ऐसे कई निर्णयों को खारिज भी कर चुका है, लेकिन संवेदनशीलता कोरोना वायरस को लेकर होनी चाहिए। देश भर में कोरोना संक्रमितों की संख्या 1.5 लाख पार कर चुकी है। यदि यह महीना दो लाख कोरोना मरीजों के साथ समाप्त हो, तो कोई हैरत नहीं होगी। क्या लोकतंत्र के मायने यही हैं कि हालात कैसे भी हों, सरकारें गिराई और बदली जा सकती हैं? बेशक मुंबई में कई अराजकताएं सामने आती रही हैं। बुधवार सुबह तक भी हजारों का जन-सैलाब सड़कों पर था। भीड़ बस की इंतजार में अकुलाए जा रही थी, लेकिन कोई ठोस सूचना नहीं दी गई। जन-व्यवस्था बनाए रखना भी राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। उद्धव सरकार इस मामले में बार-बार नाकाम रही है। भीड़ का ‘दो गज की दूरी’ या किसी अन्य एहतियात को लेकर कोई सरोकार नहीं है, क्योंकि भीड़ कोरोना वायरस को भी ‘लग्जरी’ करार दे रही है। ऐसे आधारों पर राष्ट्रपति शासन चस्पां नहीं किए जा सकते। बेशक गुजरात, तमिलनाडु, दिल्ली, राजस्थान आदि राज्यों में भी संक्रमण का आंकड़ा डराने वाला है, लेकिन फिलहाल संदर्भ महाराष्ट्र और राष्ट्रपति शासन की मांग का है, लिहाजा विश्लेषण भी उसी का होना चाहिए। बेशक कोरोना राष्ट्रीय संकट और त्रासदी भी है, कमोबेश उसका मुकाबला तो एक इकाई के तौर पर किया जाना चाहिए।

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