Monday, July 06, 2020 08:23 AM

कोरोना का आर्थिक मूल्य, डा. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक विश्लेषक

भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

यदि किसी स्थान पर संक्रमण पाया गया तो उस स्थान पर जितने कर्मी हैं, उन्हें क्वारंटाइन किया जा सकता है तथा शेष अर्थव्यवस्था चलती रह सकती है। इस व्यवस्था को लागू करने में हमको स्वास्थ्य निरीक्षकों को नियुक्त करना होगा जो कि सुनिश्चित करें कि हर संस्थान के लोग अपनी चारदीवारी के अंदर ही रह रहे हैं। उपाय है कि जिन सरकारी कर्मियों का लॉकडाउन के समय कार्य ढीला है, उन्हें स्वास्थ्य निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। जैसे अपने देश में प्राथमिक स्तर पर 58 लाख सरकारी अध्यापक हैं और माध्यमिक स्तर पर 21 लाख। तमाम खाली बैठे हैं…

कोरोना संकट का आर्थिक मूल्य हर देश को अदा करना पड़ रहा है, लेकिन इसे अदा करने के तीन अलग-अलग रास्ते हैं। पहला रास्ता ब्राजील का है। उस देश ने निर्णय लिया कि वह कोरोना का सामना करने के लिए कोई कदम नहीं उठाएगा। जितना संक्रमण होता है उसे होने देगा, जिन लोगों की मृत्यु होती है उन्हें मरने देगा, उस देश को आशा है कि जो लोग संक्रमण से बच जाएंगे उनमें कोरोना का सामना करने की इम्युनिटी विकसित हो जाएगी और अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। इस रास्ते को अपनाकर ब्राजील ने भारी मूल्य अदा किया है। ब्राजील में हर 10 लाख जनसंख्या पर 116 लोगों की मृत्यु हुई है, जबकि भारत एवं चीन में केवल तीन लोगों की। बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु का भी आर्थिक मूल्य होता है। जैसे किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि एक वर्ष अतिरिक्त जीवन जीने के लिए वह कितनी रकम अदा करने को तैयार है, तो उसके जीवन के एक वर्ष के मूल्य का आकलन हो जाता है। जैसे यदि किसी व्यक्ति की वर्तमान आयु 50 वर्ष है और देश के नागरिकों की औसत आयु 75 वर्ष है तो माना जा सकता है कि उसे 25 वर्ष और जीना है। यदि उसके द्वारा एक वर्ष अतिरिक्त जीने का दो लाख रुपए मूल्य बताया गया तो शेष जीवन का आर्थिक मूल्य 25 वर्ष गुणा दो लाख यानी 50 लाख रुपए हुआ। यदि उनकी आज मृत्यु हो गई तो मृत्यु की आर्थिक कीमत को 50 लाख रुपए माना जा सकता है। मेरे आकलन में इस प्रकार ब्राजील अपनी वार्षिक आय का लगभग छह प्रतिशत मूल्य वर्तमान में ही अदा कर चुका है और यह अभी बढ़ ही रहा है। कोरोना का मूल्य अदा करने का दूसरा रास्ता चीन द्वारा अपनाया गया है। यह है कांटैक्ट ट्रेसिंग का। इस व्यवस्था में हर व्यक्ति जो सड़क पर आता है, उसके लिए अनिवार्य होता है कि उसके पास स्मार्ट फोन हो। वह किसी भी संस्था जैसे विद्यालय या दुकान में प्रवेश करता है तो उसे केंद्रीय कम्प्यूटर से अपने ऐप के माध्यम से स्वीकृति लेनी पड़ती है। वहां पर उसका तापमान देखा जाता है। इस प्रकार केंद्रीय कम्प्यूटर को ज्ञान हो जाता है कि वह नागरिक किस समय कहां पर था।

यदि तापमान देखने पर संकेत मिले कि उस व्यक्ति को कोरोना संक्रमण हुआ हो सकता है तो कम्प्यूटर द्वारा चिन्हित कर लिया जाता है कि वह किन लोगों के संपर्क में आया होगा और उन सभी को तत्काल क्वारंटाइन किया जा सकता है। इस व्यवस्था को कारगर रूप में लागू करने के लिए जरूरी है कि हर व्यक्ति किसी भी संस्थान में प्रवेश करते समय स्वीकृति ले और इसमें तनिक भी गफलत न करे। इसके बाद सरकारी व्यवस्था इतनी चुस्त हो जो उस व्यक्ति के संपर्क में आए हुए सभी लोगों को तत्काल संपर्क कर क्वारंटाइन कर सके। इस व्यवस्था को सख्ती से लागू कर चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को पुनः चालू कर लिया है। इस व्यवस्था का आर्थिक मूल्य न्यून है, लेकिन इसे लागू करने में प्रशासनिक कुशलता चाहिए। कम्प्यूटर, स्मार्ट फोन आदि का खर्च तो लगता ही है, साथ-साथ इसमें सरकारी दखल का भी संकट है। सरकार को पता लग जाता है कि देश का हर नागरिक किन लोगों से मिला है और उस सूचना का अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को दबाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। यदि डाटा लीक हो गया तो चोर को पता लग सकता है कि आप अपने घर पर किस समय नहीं हैं और वह आपके घर में चोरी कर सकता है। अपने देश की प्रशासनिक व्यवस्था चीन की तरह चुस्त नहीं है। इसलिए इस व्यवस्था को लागू कर हम गहरे संकट में पड़ सकते हैं। अर्थव्यवस्था को खोलने से लोगों का आपसी संपर्क बढ़ेगा और कोरोना का संक्रमण भी बढ़ेगा, लेकिन यदि हम संक्रमित लोगों को चिन्हित करके क्वारंटाइन न कर सके तो परिस्थिति बेकाबू हो जाएगी। इसलिए मैं इस व्यवस्था के पक्ष में नहीं हूं। तीसरा रास्ता सोशल डिस्टेंसिंग का है जिसे न्यूजीलैंड और अपने देश में केरल ने  सफलतापूर्वक लागू किया है। इसमें नुकसान अधिक नहीं है जैसा कि ब्राजील। अपने देश में जिन राज्यों ने सोशल डिस्टेंसिंग को सही ढंग से लागू किया, वहां संक्रमण नियंत्रित हो गया और जिन राज्यों ने नहीं लागू किया, वहां संक्रमण बढ़ रहा है। अर्थात यह मध्यम व्यवस्था है, लेकिन हमारे लिए यह एकमात्र विकल्प दिखता है। सोशल डिस्टेंसिंग को लागू करने का पहला उपाय यह है कि अपने देश में जितने भी औद्योगिक संस्थान, विद्यालय और प्रापर्टी कंस्ट्रक्शन साइटें हैं, उन सभी को खोल दिया जाए, लेकिन शर्त यह लगाई जाए कि जितने भी कर्मी या छात्र हैं, उनको उस संस्थान की चारदीवारी में ही रखा जाए। उनके रहने और भोजन की व्यवस्था भी वहीं की जाए। ऐसा करने से अर्थव्यवस्था को हम तुरंत चालू कर सकते हैं।

यदि किसी स्थान पर संक्रमण पाया गया तो उस स्थान पर जितने कर्मी हैं, उन्हें क्वारंटाइन किया जा सकता है तथा शेष अर्थव्यवस्था चलती रह सकती है। इस व्यवस्था को लागू करने में हमको स्वास्थ्य निरीक्षकों को नियुक्त करना होगा जो कि सुनिश्चित करें कि हर संस्थान के लोग अपनी चारदीवारी के अंदर ही रह रहे हैं। उपाय है कि जिन सरकारी कर्मियों का लॉकडाउन के समय कार्य ढीला है, उन्हें स्वास्थ्य निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। जैसे अपने देश में प्राथमिक स्तर पर 58 लाख सरकारी अध्यापक हैं और माध्यमिक स्तर पर 21 लाख। तमाम खाली बैठे हैं। उन विद्यालयों को बंद किया जा सकता है जिनमें छात्रों की संख्या कम है। इन छात्रों को चालू रहने वाले विद्यालयों में स्थानांतरित किया जा सकता है जहां वे रहें और पढ़ें। इस प्रकार हम इनमें से आधे या 33 लाख अध्यापकों को मुक्त कर सकते हैं और इन्हें उद्योगों आदि में स्वास्थ्य निरीक्षक के रूप में नियुक्त कर सकते हैं। औद्योगिक संस्थानों को कहा जा सकता है कि वे इन स्वास्थ्य निरीक्षकों का वेतन सरकार को अदा करें। इस प्रकार सरकार पर आर्थिक बोझ भी कम होगा और औद्योगिक संस्थान अपनी आर्थिक गतिविधि को चालू करने के लिए इस मूल्य को सहर्ष अदा करना स्वीकार करेंगे। इसी प्रकार रेल और बस की संख्याओं को आधा किया जा सकता है और बचे हुए कर्मियों को रेलवे के डिब्बों और बसों में स्वास्थ्य निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। ऐसा करने से हम सोशल डिस्टेंसिंग को प्रभावी बना सकेंगे और कोरोना के संकट से हमें निकलने में मदद मिलेगी।

ई-मेलः bharatjj@gmail.com

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