Thursday, July 09, 2020 10:23 PM

कोरोना का खौफ, नहीं होगा पिपलू मेला

थानाकलां  तीन जिलों का संगम स्थल पिपलू मेला व्यक्ति विशेष न होकर तीनों जिलों के लोगों का संगम स्थल है। भारतीय संस्कृति में पर्वों का विशेष महत्व है। यहां तक कि इसे त्योहारों की संस्कृति कहना भी गलत नहीं होगा। जिसमें मेले भी शामिल हैं। मेलों के द्वारा आपसी भाईचारे की भावना में भी वृद्धि होती है, लेकिन इस दफा विश्व भर के लिए मुसीबत बना कोरोना जिला स्तरीय पिपलू मेले के लिए मुसीबत बन गया है। जिसके चलते बाबा नरसिंह देवता के प्रति आस्था रखने वाले लोगों में निराशा के बादल छा गए हैं। पिपलू मेला जहां आस्था का केंद्र है, वहीं बच्चों, बड़ों और बूढ़ों के लिए मनोरंजन का भी केंद्र है। पिपलू मेले में कुटलैहड़ क्षेत्र के साथ-साथ आस-पास की सीमाओं के साथ लगते जिलों के लोगों की आस्था जुड़ी है। हर वर्ष जून माह में होने वाले मेले में हजारों की तादाद में लोग मेले में पहुंचते हैं और दिन भर मेले का आनंद लेकर घरों को लौटते हैं। हालात ये हैं कि उपायुक्त ऊना संदीप कुमार शर्मा ने दो जून को होने वाले जिला स्तरीय पिपलू मेले की छुट्टी को स्थगित कर 13 नवंबर को छुट्टी करने की अधिसूचना जारी की है। गौर रहे कि कोविड-19 महामारी के चलते लगाए गए लॉकडाउन के कारण सरकार ने मेलों, त्योहारों व उत्सवों आदि के आयोजन पर रोक लगाई है। इसी के दृष्टिगत पूर्व में निर्धारित किए गए दो जून के स्थानीय अवकाश को निरस्त कर दिया गया है। जिला स्तरीय पिपलू मेले में खेल स्पर्धाएं, कुश्तियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं।। वहीं पशुपालन विभाग, कृषि, बागबानी, स्वयं सहायता समूह, स्वास्थ्य विभाग, बाल विकास परियोजना विभाग समेत अन्य विभागों द्वारा प्रदर्शनियां भी लगाई जाती हैं। इस दफा मेला न होने से लोगों में खासकर बच्चों में खासी मायूसी छाई है। 75 वर्षीय नारगड़ू के पंडित किशन चंद ने बताया कि इतिहास में पहली दफा पिपलू मेले का आयोजन कोरोना संकट के चलते नहीं हो पाया है। पंडित सुखदेव शास्त्री ने बताया कि पिपलू मेले के आयोजन को लेकर अनेकों दफा विवाद भी उत्पन्न हुए लेकिन मेला न हो, ऐसा कभी भी अपने जीवन में देखने को नहीं मिला।

 

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