Monday, June 01, 2020 02:33 AM

कोरोना का सवालिया डाटा

कोरोना वायरस से जुड़े डाटा पर अब सवाल उठाए जा रहे हैं। जिस डाटा के आधार पर कोरोना के डरावने सच को पेश किया जा रहा है, वह गलत, फर्जी या भ्रामक हो सकता है, लिहाजा संक्रमण के सही और सटीक आंकड़े सामने नहीं आ पा रहे हैं। हमारे सामने अर्द्धसत्य परोसा जा रहा है। संभवतः उसी में यथार्थ निहित हो! संदेह की शुरुआत 11 मई से हुई, जिसके बाद सरकारी नौकरशाहों और वैज्ञानिकों ने रोजाना की स्वास्थ्य ब्रीफिंग ही बंद कर दी। यह निर्णय अफसरों के स्तर पर कैसे लिया जा सकता है, लिहाजा सरकार ने ही वैज्ञानिकों को ‘खामोश’ रहने के आदेश दिए होंगे! हैल्थ बुलेटिन का पटाक्षेप तब हुआ, जब मीडिया के सामने एक स्लाइड की प्रस्तुति की गई, जिसमें दिखाया गया था कि 16 मई को कोरोना संक्रमण के मामले ‘शून्य’ तक घट सकते हैं। यह सरकार की ब्रीफिंग के दौरान का दावा ही माना जाएगा, क्योंकि वह स्लाइड नीति आयोग के सदस्य एवं कोरोना पर भारत सरकार की अधिकारप्राप्त कमेटी के सदस्य डा. विनोद पॉल के निर्देशन में दिखाई गई। डा. पॉल बहुत वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ हैं और कई सालों तक दिल्ली एम्स में इस विभाग के प्रमुख रह चुके हैं। 2017 से वह नीति आयोग में सेवारत हैं। सवाल है कि इतनी बड़ी, सार्वजनिक गलती, कोरोना महामारी के दौर में, क्या क्षम्य हो सकती है? लेकिन डा. विनोद पॉल के खिलाफ  कोई कार्रवाई हुई हो, ऐसा कुछ सामने नहीं आया है। बहरहाल यथार्थ सामने है कि कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 1,12,359 तक पहुंच चुकी है और आगामी कई महीनों तक ‘शून्य’ स्थिति के कोई आसार तक नहीं हैं। क्या वह आकलन गलत, फर्जी डाटा के आधार पर किया गया था? इस बीच यह भी खबर आई कि भारत सरकार के आईसीएमआर के वैज्ञानिकों को डाटा संग्रह के काम में जोता गया, जबकि यह विभाग चिकित्सा शोध का विशेषज्ञ माना जाता रहा है। नतीजा यह हो सकता है कि आईसीएमआर के वैज्ञानिकों और अफसरों ने, सरकारी बाध्यता के कारण, जो डाटा इकट्ठा किया, बेशक वह गलत और फर्जी न हो, लेकिन वह भ्रामक और सवालिया तो हो सकता है! क्योंकि डाटा संग्रह उन अफसरों का अधिकार-क्षेत्र कभी भी नहीं रहा। तो अब अहम सवाल यह है कि भारत में कोरोना वायरस की असल तस्वीर क्या है? वह कब तक प्रभावी रहेगा? क्या अन्य वायरस की तरह इसके साथ भी हमें जीना पड़ेगा? कोरोना का संक्रमण किस हद तक जा सकता है और अंततः देश में ऐसे कितने मरीज होंगे? ये सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि लॉकडाउन-4 के बावजूद बाजार खुल गए हैं, हवाई जहाजों की घरेलू उड़ानें 25 मई से शुरू हो रही हैं, रेलवे की भी 200 टे्रन एक जून से खुलना आरंभ करेंगी, उनकी बुकिंग शुरू हो चुकी है। फैक्टरियां और उद्योग समेत आर्थिक गतिविधियां भी रफ्तार पकड़ने लगेंगी। अब लॉकडाउन लगभग खुल चुका है। गौरतलब यह है कि सरकार के कुछ विशेषज्ञ सलाहकारों ने शुरू में परामर्श दिया था कि लॉकडाउन न किया जाए, बल्कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को घर-घर भेजा जाए। कोरोना पर जागरूकता फैलाई जाए और लोगों को प्रोत्साहन राशि का लालच दिया जाए। इस तरह वे खुद सार्वजनिक तौर पर आगे आकर कोरोना टेस्ट कराएंगे या जानकारी देंगे। लेकिन सरकार नहीं मानी और लॉकडाउन के तीन बड़े प्रयोग किए गए। अलबत्ता कोरोना पर लगाम लगाने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। जब संक्रमण के मामले 30,000 हुए थे, तब से लेकर अब तक प्रति दो या तीन दिन में मरीजों की संख्या 10,000 बढ़ रही है। गुरुवार की सुबह तक के 24 घंटों के दौरान 5609 नए संक्रमित केस सामने आए हैं। बेशक लोगों के ठीक होने की दर करीब 40 फीसदी हो गई है और औसत मृत्यु-दर 3.12 फीसदी है। दुनिया के कई देशों की यह दर 15-16 फीसदी तक है। अमरीका की औसत मृत्यु-दर करीब छह फीसदी है। अब हार कर केंद्र सरकार ने बहुत कुछ राज्य सरकारों के भरोसे छोड़ दिया है। राज्य सरकारें कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए दबादब शराब बेच रही हैं। राजस्व का इससे आसान जरिया कोई और नहीं है। बहरहाल मई के अंत तक कोरोना से संक्रमित होने की संख्या दो लाख पार कर जाती है, तो देश के हाथ-पांव फूलने लगेंगे। क्या उस स्थिति के लिए सवालिया डाटा ही जिम्मेदार होगा?