Monday, April 06, 2020 06:41 PM

कोरोना के खिलाफ पहरेदारी

कोरोना कर्फ्यू अब समाज की ऐसी अनिवार्य भागीदारी है जिसे जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में अंगीकार करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्र के नाम संदेश राष्ट्रीय सुरक्षा की पहली शर्त और स्वास्थ्य संस्कार की अंतिम चेतावनी भी। इसी रविवार देश अपने संयम की पहली तारीख लिखेगा और यह ऐसी शुरुआत हो सकती है, जो आगे चलकर एक आदत को हिफाजत में परिवर्तित करने की निरंतरता कायम करेगी। प्रधानमंत्री ने एक तरह से सामाजिक-सामुदायिक अलार्म बजाकर सभी को कोरोना के खिलाफ पहरेदार बना दिया है। यह इस वक्त का ऐसा संदर्भ है, जो हर व्यक्ति का दायित्व सुनिश्चित कर रहा है। इस दौर में प्रशासनिक-चिकित्सकीय सेवाओं से भी अधिक इनसान को इनसान की जरूरत है। यहां हर व्यक्ति को इनसान बनकर सोचना है और इनसानियत यह कहती है कि अगर हम सभी एक दूसरे का बचाव करें, तो ही जीवन का बोध बचेगा। यानी पहली बार विज्ञान भी यह हिदायत दे रहा है कि मनुष्य इस विपदा को इनसान बनकर ही मिटा सकता है। संसार की अपनी मजबूरियां हैं और जीवन की भागदौड़ ने हमें खुदगर्जी का मोहताज बना दिया है। कल तक बेहतर चिकित्सा से कोई अमीर बच सकता था, लेकिन आज जो बचेंगे वही बेहतर इनसान कहलाए जाएंगे। आज जो क्षमता प्रशासन, सरकार या डाक्टरी पढ़ाई की है, उससे कहीं आगे ‘जनता कर्फ्यू’ सरीखे प्रयत्न की काबीलियत और क्षमता है। ऐसे में रविवार का दिन महज खामोशी का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंतन और मानवीय मंथन का रहेगा। यह हर भूमिका को उसकी पहरेदारी में देख रहा है। बावजूद इसके कि देश में ‘बंद’ जैसे हालात हैं, कुछ सेवाएं मानवार्थ जारी रहेंगी। आवश्यक खाद्य पदार्थों की आपूर्ति, अस्पतालों की जिम्मेदारी, मीडिया की सक्रियता और प्रशासन की कार्रवाइयों में आप सभी के सहयोग की आवश्यकता है। इस नाजुक दौर में मानवीय व्यवहार को नए सिरे से लिखने की ओर हम सभी बढ़ रहे हैं, लिहाजा आदत और जरूरत में भी अंतर करना होगा। अगर हम कुछ समय के लिए आदतें छोड़कर अति आवश्यक सेवाओं या आधारभूत जरूरतों पर गुजारा करेंगे, तो ऐसी राष्ट्रीय परिपाटी का संबल सभी नागरिकों को एक समान दृष्टि से देखेगा। कुछ व्यवसाय इस दौरान भी सबसे अधिक लोगों के संपर्क में रहेंगे, इसलिए टैक्सी चालकों, नाई-धोबी तक दुकानदारों को खासी एहतियात बरतनी होगी। मीडिया कर्मी भी फोन, ईमेल व खुद की सुरक्षा में सूचनाएं एकत्रित करें, जबकि यह समय पत्रकारिता का अंदाज और सूचना का धर्म बदल रहा है। हम चाहें तो समाज और संस्कृति की बुनियादी जरूरतें बदल सकते हैं और संयम से इस दौर को मानवता का सर्वश्रेष्ठ इतिहास बना सकते हैं। इस दौर में भी तो कई मामले अदालतों में फंसे होंगे। सोचें कि इनमें से कितने ऐसे विषय होंगे, जिन्हें आपसी सुलह से निपटा सकते हैं। संयम का यह दौर हमारे अहंकार को मिटा सकता है, पड़ोसी को गले से लगा सकता है। हर व्यक्ति अगर ठान ले कि देश के लिए ही उसे सुरक्षित रहना है, तो हम सभी एक दूसरे के काम आएंगे। फिर कहीं बालीवुड गायिका कनिका कपूर सरीखा कोई सिरफिरा अगर हमारी सुरक्षा में छेद करे, तो उसका सामाजिक बहिष्कार करना होगा। जाहिर तौर पर कोरोना के खिलाफ जंग लड़नी है तो सामाजिक व्यवस्था के सरोकार ऊंचे करने पड़ेंगे। इस दौर में ‘वीआईपी’ मानसिकता, अधिकार प्राप्त लोग, ओहदेदार या सत्ता की शक्ति कोई मायने नहीं रखती। यहां मसला किसी छोटे-बड़े अस्पताल का भी नहीं, बल्कि अगर कोई इस दौर की पहरेदारी में एहतियाती कदमों को निभा गया तो छोटे से छोटा गांव भी सबसे बड़ा भगवान साबित होगा। आइए इस रविवार ‘सामाजिक कर्फ्यू’ की राह पर चलकर देश और समाज के रक्षक बन जाएं। खुद को बचाएंगे, तो सभी बचेंगे। यही इस वक्त का सबसे बड़ा राष्ट्र धर्म भी है।